नरेन्द्र मोदी : स्वामी विवेकानंद की तीसरी भविष्यवाणी का ‘भारत भाग्य विधाता’ !

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* स्वामी विवेकानंद की 117वीं पुण्यतिथि पर विशेष

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 4 जुलाई, 2019 (YUVAPRESS)। माँ भारती और उसकी भूमि पर अवतार परम्परा का कोई गणनीय इतिहास नहीं है। बस, यह तो एक परम्परा है। इसका न कोई आदि है और न ही कोई अंत, क्योंकि भारत एक सनातन धर्म धारी देश है। इसीलिए कोई यदि यह दावा करे कि भगवान विष्णु के प्रथम अवतार सनकादिक मुनि से पहले और तेईसवें अवतार भगवान बुद्ध के बाद ईश्वर ने कोई अवतार नहीं लिया, तो यह दावा अनुचित है, क्योंकि ईश्वर के अवतार लेने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और ज्ञानी संतों के रूप में तो ईश्वर निरंतर अवतरित ही रहते हैं।

विज्ञान और प्रमाण को ही सत्य मानने वाले आज के युग में भले ही स्वयं हमारे ही देश में सनातन धर्म की हर उस बात को केवल मायथोलॉजी यानी पौराणिक मान्यता ठहरा दिया जाए, परंतु आधुनिक युग और विश्व भारत के सम्पन्न सनातनी इतिहास को नकार नहीं सकता, जिसमें तुलसीदास, मीराबाई, नरसिंह मेहता, आचार्य विनोबा भावे, महर्षि अरविंद, जे. कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि, श्रीमद राजचंद्र, रामकृष्ण परमहंस से लेकर स्वामी विवेकानंद सहित सैकड़ों महापुरुष शामिल हैं। इनमें महात्मा गांधी का नाम भी जोड़ा जा सकता है, जिन्होंने बिना शस्त्र उठाए गोरों को भारत भूमि से खदेड़ा, परंतु जिस तरह भगवान राम या कृष्ण को उनके कालखंड में उन्हें ईश्वर न मानने वालों की कोई कमी नहीं थी, उसी तरह गांधी को भी अवतार कहना जल्दबाज़ी होगी। कुछ हजार साल बीतने के बाद गांधीजी को भी यही देश पूजेगा और मानेगा कि वे भी ईश्वर का एक अवतार ही थे।

वैसे मैं भारत भूमि पर अवतरित हुए इन सभी महापुरुषों का वर्णन नहीं करने जा रहा हूँ। मैं तो महापुरुष रूपी हीरों की इस खान में से एक चमचमाता हीरा उठा कर उसके बारे में कुछ कहना चाहता हूँ, क्योंकि आज उसकी 117वीं पुण्यतिथि है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ स्वामी विवेकानंद की। 12 जनवरी, 1863 को जन्म लेने के बाद नरेन्द्र नाम धारण करने वाले इस बालक ने 4 जुलाई, 1902 को मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में महाप्रयाण किया, तब वह स्वामी विवेकानंद बन चुका था। बचपन से ही ईश्वर को पाने की ललक लिए नरेन्द्र की मंशा तब पूर्ण हुई, जब उनके जीवन में गुरु रामकृष्ण परमहंस का प्रवेश हुआ। इसके बाद नरेन्द्र नाथ दत्त ने भारतीय अध्यात्म और परिपूर्ण वेदांत दर्शन में ओतप्रोत होकर वह परम पद प्राप्त किया, जो करोड़ों में किसी एक को प्राप्त होता है। जब 11 सितम्बर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में भारत के इस मात्र 30 वर्षीय संत ने विश्व धर्म संसद में भारत की वैदिक संस्कृति और सनातन धर्म का डंका बजाया, तब पूरा विश्व चौंक उठा और इसके साथ ही पूरे भारत को भी अनुभूति हुई कि नरेन्द्र नाथ दत्त कोई साधारण पुरुष नहीं। इसीलिए तो गुरु रामकृष्ण परमहंस ने उनका नाम विवेकानंद रखा था, जिसका अर्थ होता है विवेकपूर्ण जीवन जीते हुए आनंदित रहना।

यद्यपि आज स्वामी विवेकानंद की 117वीं पुण्यतिथि है, परंतु मेरी मंशा उनके जीवन चरित्र पर प्रकाश डालने की नहीं है, क्योंकि उनके बारे में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है। मैं स्वामी विवेकानंद की 117वीं पुण्यतिथि पर दो बातें कहना चाहता हूँ। पहली यह कि मेरे दावे के अनुसार स्वामी विवेकानंद वह पुरुष थे, जिन्होंने ईश्वर का निराकार साक्षात्कार किया था। दूसरी बात यह कि जब कोई व्यक्ति ज्ञानी पुरुष बन जाता है, तब उसकी सभी इंद्रियाँ ज्ञानमयी हो जाती हैं और वह अपने भीतर-बाहर, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सब कुछ देख-सुन-समझ सकता है। ईश्वर से एकाकार कर चुका पुरुष न केवल भूत, अपितु भविष्य भी अच्छी तरह जानता है। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद भी भविष्य जानते थे और उन्होंने भी अपने 39 वर्षीय जीवन काल में तीन भविष्यवाणियाँ की थीं, जिनमें से दो सत्य सिद्ध हुईं और जो तीसरी भविष्यवाणी थी, वह भी सत्य होती प्रतीत हो रही है।

50 साल पहले कर दी थी स्वतंत्रता की भविष्यवाणी

आइए, पहले विवेकानंद की 2 भविष्यवाणियों की बात करते हैं, जिनके बारे में जान कर आपको विष्मयपूर्ण आश्चर्य होगा। विवेकानंद ने ये दोनों भविष्यवाणी दशकों पहले की थी। उन्होंने जो भविष्य देखा था, उसकी तत्कालीन समय में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, परंतु वे दोनों भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई थीं। 1863 में जब विवेकानंद का जन्म हुआ था, तब पराधीन भारत स्वतंत्रता के लिए किए गए एक महाविप्लव की विफलता की निराशा में डूबा हुआ था। 1857 के विप्लव में मिली घोर विफलता को अभी 6 ही वर्ष हुए थे। अंग्रेजों की दासता से मुक्ति की इच्छा रखने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के हौसले पस्त हो चुके थे। स्वतंत्रता का सपना सदियों पीछे जा चुका था। विवेकानंद एक आध्यात्मिक पुरुष थे। एक भारतीय होने के नाते वे भी अपने एकेश्वर से निरंतर प्रार्थना करते थे कि भारत स्वतंत्र हो जाए। इसी बीच 1890 में स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘भारत अकल्पनीय परिस्थिति के बीच भी आगामी 50 वर्षों में स्वतंत्र हो जाएगा।’ आप सोचिए, विवेकानंद ने 50 वर्ष पहले आगामी 50 वर्ष में घटने वाली घटना की भविष्यवाणी कर दी थी अर्थात् वे जानते थे कि अंग्रेजों को भगाने के लिए 1859 में जो मोहनदास करमचंद गांधी जन्म ले चुका है, वह आगे चल कर महात्मा गांधी बनेगा और उसके नेतृत्व में 1947 में भारत स्वतंत्र होगा। यह थी विवेकानंद की पहली भविष्यवाणी, जो 1890 में की गई और 1947 में सही सिद्ध हुई। अब बात करते हैं स्वामी विवेकानंद की दूसरी भविष्यवाणी की, जो उन्होंने 8 मार्च, 1917 को हुई रूसी श्रमिक क्रांति के बारे में की थी। इस क्रांति से पूर्व श्रमिक क्रांति के प्रवक्ता मार्क्स ने कहा था कि क्रांति वहीं होगी, जहाँ मजदूर आंदोलन मजबूत होगा। मार्क्स के कथन पर विश्वास करें, तो श्रमिक क्रांति जर्मनी में होनी चाहिए थी, परंतु स्वामी विवेकानंद ने तो वर्षों पहले ही कह दिया था कि श्रमिक क्रांति रूस में होगी, जबकि जब विवेकानंद ने यह भविष्यवाणी की, तब कृषि प्रधान देश रूस में कोई श्रमि आंदोलन नहीं चल रहा था। प्रश्न यह उठता है कि अंतत: विवेकानंद ने मार्क्स के कथन के बावजूद कैसे यह भविष्यवाणी कर दी कि श्रमिक क्रांति रूस में होगी।

भारत का दूसरा ‘नरेन्द्र’, जिसने भगवा धारण नहीं किया…

स्वामी विवेकानंद ने वैसे तो अपने जीवन में कई भविष्यवाणियाँ की थीं, क्योंकि वे ज्ञानी पुरुष थे और दीर्घदृष्टा भी थे, परंतु मैंने यहाँ उनकी 2 सटीक भविष्यवाणियों का पहले उल्लेख इसलिए किया, ताकि आपको विश्वास हो जाए कि स्वामी विवेकानंद ने आज से लगभग 125 वर्ष पहले के कालखंड में जो तीसरी भविष्यवाणी की थी, वह भी वास्तव में सत्य होने की ओर अग्रसर है। आइए, सबसे पहले आपको बताता हूँ कि विवेकानंद ने क्या भविष्यवाणी की थी ? स्वामी विवेकानंद ने अपने निधन से कुछ वर्ष पहले एक और भविष्यवाणी की थी, ‘भारत पुन: एक बार समृद्धि और शक्तियों के उच्च स्थान पर विराजमान होगा। भारत उसके प्राचीन गौरव से अधिक गौरव की प्राप्ति करेगा।’ वैसे स्वामी विवेकानंद की 2 भविष्यवाणियों में तो एक निश्चित घटनाक्रम का उल्लेख था, जो सही साबित हुई, परंतु यह तीसरी भविष्यवाणी गूढ़ और मार्मिक है। मैं स्वामी विवेकांनद की 117वीं पुण्यतिथि पर आज उनकी इस तीसरी भविष्यवाणी को आधुनिक भारत के भाग्य विधाता के रूप में उभरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जोड़ कर देखता हूँ। स्वतंत्र भारत के इतिहास में नरेन्द्र मोदी ही एकमात्र ऐसे प्रथम प्रधानमंत्री हैं, जो भारत की प्राचीन, पौराणिक, वैदिक, वेदांत, ऋषि, सनातन धर्म परम्पराओं पर गर्व करते हैं। लोकसभा चुनाव 2014 में पहली बार विजयी बनने के बाद से लेकर लोकसभा चुनाव 2019 में दूसरी बार विजयी बनने और उसके बाद के अनेक प्रसंगों में नरेन्द्र मोदी ने सदैव भारत के उन महान पुरुषों को उद्घृत किया, जिनका नाम लेने से भारतीय राजनीति के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता थर-थर काँपते आए हैं। मुझे याद आता है 26 मई, 2019 का वह दिन, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाराणसी से मिली दूसरी जीत के बाद आभार प्रकट करने वहाँ पहुँचे थे। इस दौरान मोदी ने अपने भाषण में कहा था, ‘लोगों को होगा संकोच, परंतु मुझे हमारी सनातन संस्कृति, हमारी वैदिक-ऋषि परम्परा, हमारे महापुरुषों पर गर्व है। मुझे वंदे मातरम् बोलने में कोई संकोच नहीं है।’ यही बात है, जो मोदी को स्वतंत्र भारत के सभी राजनेताओं से अलग बनाती हैं। मोदी संसार में रह कर भी संन्यस्त हैं। वे हिमालय में रह चुके हैं। उनके आदर्श पुरुषों में सबसे ऊपर विवेकानंद ही हैं, तो मोदी राम-कृष्ण जैसे तथाकथित पौराणिक महापुरुषों से लेकर प्राचीन-ऐतिहासिक भारतीय आध्यात्मिक-सनातनी महापुरुषों से भी प्रेरित हैं। कुल मिला कर यदि यह कहा जाए कि नरेन्द्र मोदी भारत के दूसरे ‘नरेन्द्र’ हैं, तो अनुचित नहीं होगा। संभव है स्वामी विवेकानंद ने तीसरी भविष्यवाणी में भारत के भाग्य के जिस नए विधाता का संकेत किया है, वह नरेन्द्र मोदी ही हों।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वामी विवेकानंद की भविष्यवाणी के बहुत निकट प्रतीत होते हैं,

(1) क्योंकि नरेन्द्र मोदी की सोच का मूल पूरे विश्व में अनादिकालीन सनातन धर्म का डंका बजाने वाले स्वामी विलेकानंद विवेकानंद हैं।

(2) क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने केवल भगवा धारण नहीं किया है, परंतु कर्म से वे भारत के दूसरे विवेकानंद से कम नहीं हैं।

(3) क्योंकि नरेन्द्र मोदी को भारत की मूलाधार ‘वेद-पुराण-वैदिक-वेदांत-ऋषि परम्परा’ पर गर्व है।

(4) क्योंकि नरेन्द्र मोदी ऐसे पहले राजपुरुष हैं, जिन्होंने लाल किले की प्राचीर से लेकर संसद तक भारत के आध्यात्मिक महापुरुषों को उद्घृत किया।

(5) क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने ही राम, कृष्ण, शंकराचार्य, अरविंद, रामकृष्ण, विवेकानंद, विनोबा भावे से लेकर महात्मा गांधी सहित कई महापुरुषों को पुनर्जीवित किया, जो तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टीकरण के बोझ तले वर्षों से दबाए-कुचले जा रहे थे।

(6) क्योंकि नरेन्द्र मोदी को माँ भारती की भूमि पर ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करने में अन्य नेताओं की तरह संकोच नहीं है।

(7) क्योंकि नरेन्द्र मोदी की विशाल दीर्घदृष्टिपूर्ण विचारधारा में जाति-धर्म की संकीर्णता नहीं, अपितु ‘वसुधैव कुटु्म्बकम्’ सर्वोपरि है और इसीलिए दोबारा सरकार बनने के बाद उन्होंने अपने लक्ष्य ‘सबका साथ-सबका विकास’ में ‘सबका विश्वास’ जोड़ा। इसके माध्यम से मोदी और उनकी सरकार देश में निरंतर वोट बैंक की राजनीति के कारण तुष्टीकृत हुए अल्पसंख्यक समुदाय का विश्वास जीतना चाहती है, ताकि भारत को मूल संस्कृति से जोड़ कर रखते हुए भी विकास की नई ऊँचाइयों तक ले जाया जा सके।

(8) क्योंकि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे संन्यस्त गृहस्थ हैं, जिनके लिए पूरा भारत और विश्व ही उनका परिवार है। वह संन्यासी सम्राट हैं, जिनका इस दुनिया में कुछ भी नहीं है, परंतु पूरी दुनिया उनकी ही है।

(9) क्योंकि नरेन्द्र मोदी का लक्ष्य केवल सरकार बनाना नहीं, अपितु देश बनाना है। उनके लिए दल से ऊपर देश है, जहाँ राष्ट्रवाद से ऊपर कुछ नहीं है। माँ भारती की रक्षा के लिए कुछ भी गुज़रने का उनमें जज़्बा है, जो उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे साहसिक कारनामे करने को प्रेरित करता है। तुच्छ राजनीति करने वालों को इन कारनामों में चुनावी स्टंट दिखाई देता है, परंतु वे यह भूल जाते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक के समय कौन-सा चुनाव होने वाला था।

(10) क्योंकि नरेन्द्र मोदी उसी 117 वर्ष पूर्व के स्वामी विवेकांनद के आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हैं, जिसमें भारत, उसका सनातन धर्म, उसकी संस्कृति, जात-पाँत और धर्म की दीवारों से मुक्त समाज का निर्माण करना ही मुख्य लक्ष्य है और लोकसभा चुनाव 2019 में देश की जनता ने मोदी के इस पथ पर अपने मतों से हस्ताक्षर भी किए हैं।

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