जानिए कैसे एक साधारण फल से ‘श्रीफल’ बन गया नारियल ?

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* 51वें विश्व नारियल दिवस पर विशेष

अहमदाबाद 2 सितम्बर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में अनादि काल से पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठा, विधि-विधान सहित सभी प्रकार के धार्मिक कार्य ईश्वर पर लोगों की आस्था और विश्वास के प्रतीक रहें हैं और हर तरह के धार्मिक क्रियाकलापों में मुख्य रूप से श्रीफल के रूप में नारियल का उपयोग होता रहा है। आज जब गणेश चतुर्थी है, तब भी विघ्नहर्ता की स्थापना और पूजन के दौरान श्रद्धालू नारियल का भोग चढ़ाया गया होगा। भगवान गजराज की पूजा के साथ ही लोगों ने ‘आस्था चिह्न’ कलश की स्थापना भी की होगी और उस पर रखा होगा एक नारियल। मान्यता है कि हिन्दु धर्म में नारियल के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है, परंतु क्यों ? क्या इसकी शुरूआत कैसे हुई ? पवित्रता के पत्रीक नारियल की उत्पत्ति कहाँ से हुई ?

आप सोच रहे होंगे कि आज हम नारियल को लेकर इतने सवाल क्यों उठा रहे हैं, तो आपको बता देना चाहेंगे कि जितना महत्व मानव जाति के लिए नारियल का है, उतना ही महत्वपूर्ण दिन आज नारियल के लिए है, क्योंकि आज विश्व नारियल दिवस (WORLD COCONUT DAY) है ? यही कारण है कि हम उस नारियल की तह में उतरने का प्रयास करने जा रहे हैं, जिसे लोग ऊपर से छील कर प्रसादी के रूप में ग्रहण करते हैं।

साधारण भाषा में तो नारियल पूजा-पाठ और खाने-पीने के काम आने वाला एक फल है, जिससे हम पूजा करते हैं और जिसके डाभ (डाभ नारियल के कच्चे फल को कहते हैं) से बने व्यंजनों को बड़े चाव से खाते भी हैं। आपने नारियल के बारे में बहुत कुछ पढ़ा-सुना होगा कि नारियल एक अत्यंत उपयोगी फल है, नारियल देर से पचने वाला, मूत्राशय शोधक, ग्राही, पुष्टिकारक, बलवर्धक, रक्तविकार नाशक, दाहशामक तथा वात-पित्त नाशक है, नारियल की तासीर ठंड़ी होती है और इसे औषिधि के रिप में भी प्रयोग किया जाता है… आदि, परंतु आज जब पूरा विश्व नारियल दिवस मना रहा है, तब हम आपको नारियल के पूरे इतिहास-भूगोल से अवगत कराने का प्रयास करने जा रहे हैं।

जब सत्यव्रत का सिर ‘श्रीफल’ बन गया

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भारत में नारियल का इतिहास सतयुग में हुए राजा सत्यव्रत से जुड़ा है। कौशल के राजा राजा सत्यव्रत का उल्लेख मत्स्य पुराण में भी मिलता है। सत्यव्रत एक प्रतापी राजा थे। सत्यव्रत के समकालीन राजर्षि विश्वामित्र एक बार तपस्या करने के लिए कहीं दूर चले गए और उनके क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा। उस समय राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के परिवार की रक्षा की। इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने राजा को स्वर्ग जाने का वरदान दिया, परंतु देवताओं ने सत्यव्रत को स्वर्गलोक से बाहर निकाल दिया। क्रोधित विश्वामित्र ने राजा के लिए एक नया स्वर्ग लोक बनाने का आदेश दिया। नये स्वर्ग लोक के नीचे एक खंभे का निर्माण हुआ, जो बाद में एक मोटे पेड़ और राजा सत्यव्रत का सिर एक फल में बदल गया। कहते हैं कि यह फल ही श्रीफल कहलाया, जिसे हम नारियल कहते हैं। रामायण और श्रीलंका के साहित्य में भी नारियल का उल्लेख मिलता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नारियल का अस्तित्व तब से है, जब इस संसार की उत्पत्ति हुई।

आधुनिक इतिहास में किसने खोजा नारियल ?

यह तो बात हुई पौराणिक काल की। यदि प्राचीन इतिहास पर नज़र डालें, तो सन् 1521 में जब पुर्तगाल और स्पेन के खोजकर्ता समूद्र यात्रा पर निकले और खोज करते-करते हिन्द प्रशांत महासागर के पास पहुँचे, तो समूद्र के किनारे उन्हें बहुत से लंबे-लंबे बेड़ दिखे, जिस पर फल भी लगे हुए थे। ये फल एक एक चेहरे के समान, तीन छिद्रों वाले थे। फलों की आकृति के अनुसार खोजकर्ताओं ने इस फल का नाम कोको या कोका दिया (coco or coca ), जो हिन्दी में पहले से ही नारियल कहलाता है, वहीं पुर्तगाली (Portuguese) लोककथाओं और गीतों में नारियल को भूत या चुड़ैल से जोड़ा जाता है। वैज्ञानिकों ने नारियल का वैज्ञानिक नाम Cocos Nucifera दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार नारियल ताड़ के पेड़ परिवार (Arecaceae) और जीनस Cocos की एकमात्र जीवित प्रजातियों का सदस्य है, जो वनस्पति रूप से एक बीज या फल है।

भारत में कहाँ पाया जाता है नारियल ?

वर्तमान समय में भारत के चार दक्षिणी प्रदेशों केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में नारियल की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ बना कर भी नारियल का उपयोग किया जाता है और भारत ही नहीं, अपितु दुनिया में बड़े पैमाने पर इसका व्यापार भी होता है। नारियल से बनी वस्तुओं के निर्यात से भारत को लगभग 470 करोड़ रुपए की राष्ट्रीय आमदनी होती है।

क्यों 2 सितंबर को मनाया जाता है विश्व नारियल दिवस ?

प्रति वर्ष 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस ( World Coconut Day ) मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य नारियल की खेती को बढ़ावा देना और नारियल के महत्तव को विश्व में पहुँचाना है, जिससे नारियल के कच्चे माल के निर्यात में वृद्धि के साथ-साथ नारियल उत्पाद करने वाले किसानों को भी फायदा मिल सके। विश्व नारियल दिवस मनाने की शुरुआत 1969 में एशियाई व प्रशांत नारियल समुदाय (APCC) ने की थी। इसी दिन इंडोनेशिया के जकार्ता में एपीसीसी की स्थापना हुई थी। तभी से विश्व नारियल दिवस मनाने का आरंभ हुआ और आज 51वें विश्व नारियल दिवस मनाया गया।

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