जानिए सृष्टि के इस ‘नीलकंठ’ को, जो घातक सूर्य किरणों को बनाता है सौम्य

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 16, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। नीलकंठ का शाब्दिक और भावार्थ तो आप जानते ही होंगे। नीलकंठ भगवान शिव का ही एक नाम है। नीलकंठ का भावार्थ है, जिसका कंठ नीला हो। भगवान शिव का कंठ समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए हलाहल विष को पीने के कारण नीला हुआ था। माता पार्वती की शक्ति के कारण यह विष भगवान शिव के कंठ तक ही रहा था और तभी से शिव का एक नाम नीलकंठ पड़ गया।

हम यहाँ नीलकंठ वर्णी शिव का उल्लेख इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आज पूरी दुनिया विश्व ओज़ोन दिवस मना रही है। आप सोच रहे होंगे कि शिव और ओज़ोन का क्या संबंध है ? आज हम पौराणिक कथा या इससे जुड़ी मान्यताओं पर चर्चा नहीं करने जा रहे, अपितु हम आपको धरती के एक ऐसे नीलकण्ठ से परिचित कराने जा रहे हैं, जो हर रोज हलाहल विष के समान जीव सृष्टि के लिए घातक ज्वालाओं को पीकर हमें सौम्य प्रकाश प्रदान करता है। इस नीलकंठ का नाम है ओज़ोन परत। वास्तव में समुद्र मंथन से निकले विष को जिस प्रकार भगवान शिव ने ग्रहण कर सृष्टि की रक्षा की थी, उसी प्रकार ओज़ोन भी एक ऐसी परत है, जो सूर्य से निकलने वाली घातक पैराबैंगनी (UV) किरणों से सृष्टि की रक्षा करती है। यदि यह ओज़ोन परत न हो, तो पृथ्वी पर जीव सृष्टि की संभावना ही समाप्त हो जाएगी। इसीलिए आधुनिक युग में यह ओज़ोन परत भगवान शिव के नीलकंठ अवतार की तरह जीव सृष्टि के लिए वरदान है।

आज से 32 वर्ष पहले यानी 16 सितंबर, 1987 को ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) नामक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जो ओज़ोन परत को क्षीण करने वाले पदार्थों के बारे में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है। मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल पहला ऐसा सफल समझौता है, जिसे 196 राज्यों द्वारा मान्यता दी गई। इसका उद्देश्य ओज़ोन परत के संरक्षण हेतु लोगों को जागृत करना है। इस संधि के समय लक्ष्य रखा गया कि पूरे विश्व में 2010 तक ओज़ोन फ्रेंडली वातावरण बनाया जाए। यद्यपि आधुनिकता की अंधी दौड़ लगा रही दुनिया अभी भी इस लक्ष्य से दूर है, परंतु ओज़ोन परत बचाने की दिशा में विश्व ने उल्लेखनीय कार्य किया है। ओज़ोन परत को बचाने की कवायद का ही परिणाम है कि आज बाज़ार में ओज़ोन फ्रेंडली फ्रिज, कूलर आदि आ गए हैं। इस परत को बचाने के लिए आवश्यक है कि फोम के गद्दों का इस्तेमाल न किया जाए। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम हो। रूम फ्रेशनर्स व केमिकल परफ्यूम का उपयोग न किया जाए और ओज़ोन फ्रेंडली रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशन का ही इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा अपने घर की बनावट ओज़ोन फ्रेंडली तरीके से किया जाए, जिसमें रोशनी, हवा व ऊर्जा के लिए प्राकृतिक स्रोतों का प्रयोग हो।

कैसे जीव सृष्टि के लिए वरदान है ओज़ोन परत ?

जिस प्रकार साँस लेने के लिए हवा और जीने के लिए पानी की अवश्यकता होती है, उसी प्रकार दुनिया को अंधकार से मुक्त करने के लिए सूर्य की किरणें भी अति आवश्यक हैं, परंतु यदि सूर्य की किरणें सीधे हम तक पहुँचने लगें, तो हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होंगी, क्योंकि सूर्य से निकले वाली पैराबैंगनी किरणें (Ultraviolet Rays) यानी यूवी किरणें त्वचा कैंसर का मुख्य कारण होती हैं। सूर्य की ये यूवी किरणें हम तक पहुँचने से पहले धरती की ओज़ोन परत से होकर गुजरती है, जहाँ ओज़ोन परत इन किरणों को फिल्टर कर सौम्य बना देती है और हम इससे होने वाले नुकसान से बच जाते हैं। ओज़ोन परत हल्के नीले रंग की एक गैस है, जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं (O3) का यौगिक है, जिसकी खोज 1913 में फ्रांस के भौतिकविदों फैबरी चार्ल्स और हेनरी बुसोन ने की थी। ओज़ोन परत सामान्यत: धरातल से 10 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई के बीच स्थित होती है। ओज़ोन गैस सूर्य से निकलने वाली यूवी किरणों के लिए एक फिल्टर का काम करती है. परंतु ग्लोबल वॉर्मिंग-क्लाइमेट चेंज जैसे कारणो के चलते धीरे-धीरे यह जीवन रक्षक ओज़ोन परत नष्ट हो रही है। विषाक्त गैसों से ओज़ोन परत में कई छेद हो गए हैं, जिसका मुख्य कारण प्रशीतक (Refrigerant), क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (Chlorofluorocarbons) और हैलोन (Halon) नामक विषाक्त गैसें हैं। ये गैसें मनुष्य द्वारा अधिक मात्रा में प्रयोग किए जोने वाले इलेक्टॉनिक उपकणों जैसे कूलर, रेफिरेजेरेटर में प्रयोग की जाती हैं, जिससे ओज़ोन परत को नुकसान पहुँच रहा है।

तेजी से घट रही है ओज़ोन की मात्रा

वायुमंडल में ओज़ोन की मात्रा प्रतिवर्ष 0.5 प्रतिशत की दर कम हो रही है। अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के ऊपर स्थित वायुमंडल में 20 से 30 प्रतिशत ओज़ोन परत कम होने के कारण छेद हो गए हैं। साथ ही उत्तरी ध्रुव में भी बसंत ऋतु में ओज़ोन परत में छिद्र होने के संकेत मिले हैं। आज ओज़ोन को बचाने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि हम ओज़ोन को नष्ट करने वाली विषाक्त गैसों का प्रयोग करना बंद कर दें। फोम और प्लास्टिक का कम से कम प्रयोग करें।

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