विश्व डाक दिवस : 253 साल पुरानी है भारत की डाक परम्परा

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 9 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। “डाकिया डाक लाया, डाक लाया” ये गीत तो आपने अवश्य सुना होगा, परंतु बढ़ती टेक्नोलॉजी और मोबाइल फोन के प्रभाव ने भावी पीढ़ी से पत्र व्यवहार की परंपरा ही छीन ली है। अब तो एक बटन में सारी सूचनाएँ एक दूसरे को आदान-प्रदान की जा रही हैं। वहीं पहले जब साइकिल की घंटी बजाते हुए एक डाकिया घर के दरवाजे पर आता था, तो सभी के मन में एक उमंग-सी दौड़ जाती थी और प्रश्न उठता था कि किसका पत्र आया होगा, परंतु आज यह केवल व्यापारिक और सरकारी दस्तावेजों तक सिमटती जा रही है। आज हम पत्र या डाक की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आज 145वाँ विश्व डाक दिवस है। आज ही के दिन यानी 9 अक्टूबर, 1969 को “यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन” की स्थापना दिवस को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की गई थी। आइए जानते हैं डाक का इतिहास।

डाक का इतिहास

आज पूरी दुनिया में डाक दिवस (World Post Day) मनाया जा रहा है। डाक प्रणाली कई शताब्दियों से प्रचलन में थी। इतिहासकारों के अनुसार लोग एक दूसरे को अपने विशेष दूत के हाथों पत्र पैदल, घोड़े या पानी के जहाज से भेजा करते थे। ई. स. 1600 में कई देशों ने राष्ट्रीय डाक प्रणाली की शुरुआत की। ये अधिक संगठित प्रणाली थी और कई लोग इसका उपयोग कर सकते थे। धीरे-धीरे कई देशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेश का आदान-प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की और ई. स. 1800 में वैश्विक स्तर पर डाक सेवा शुरू हुई, परंतु यह एक धीमी और जटिल प्रक्रिया थी। 9 अक्टूबर, 1874 को स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) का गठन किया गया था, जिसके अंतर्गत 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, इसके बाद 9 अक्टूबर, 1969 में जापान के टोक्‍यो में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसी सम्मेलन में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाने के निर्णय की घोषणा की गई थी। डाक सेवाओं और डाक विभाग के विषय में लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से यह दिन मनाने की शुरुआत की गई थी। डाक विभाग लंबे समय से भारत ही नहीं, अपितु दूसरे देशों तक भी सूचना पहुँचाने का सबसे विश्वसनीय और सस्ता साधन रहा है।

भारत में डाक सेवा का प्रारम्भ

1 जुलाई, 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश था। जनसंख्या और अंतरराष्‍ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर भारत शुरू से ही फर्स्‍ट कैटेगरी का सदस्य रहा है। हालाँकि 1766 में लॉर्ड क्लाइव ने भारत में प्रथम डाक व्यवस्था की स्थापना की थी, परंतु भारत में डाक घर को 1 अक्टूबर 1854 को राष्ट्रीय महत्व के प्रथक रूप से डायरेक्टर जनरल के संयुक्त नियंत्रण में मान्यता दी गई थी। भारत के पोस्टल नेटवर्क में चार कैटेगरी के डाक घर हैं, प्रधान डाक घर, उप डाक घर, अतिरिक्त विभागीय उप डाक घर और अतिरिक्त विभागीय शाखा डाक घर। सभी डाक घर एक जैसी पोस्टल सेवाएं प्रदान करते हैं। हालांकि, डिलिवरी का काम विशिष्ट डाक घरों का दायित्व है। भारत में आधुनिक व्यवस्था की शुरुआत 18वीं शताब्दी तक हो चुकी थी, जिसका विकास 1774 में अंग्रेज़ राजनीतिज्ञ, फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी (बंगाल) के प्रथम गवर्नर और बंगाल की सुप्रीम काउंसिल के अध्यक्ष वारेन हेस्टिंग्स ने कोलकाता में जीपीओ की स्थापना करके किया था। इसके बाद 1786 में बम्बई प्रधान डाकघर (अब मुंबई) और 1793 में मद्रास प्रधान डाकघर (अब चेन्नई) की स्थापना की गई थी।

अब आया ई-पोस्ट का ज़माना

30 जनवरी, 2004 को डाकघर के 150वें स्थापना दिवस पर ई-पोस्ट सेवा की शुरुआत की गई थी। डिजिटलाइजेशन के दौर में दुनिया भर की डाक व्यवस्थाओं ने स्वयं को नई तकनीकी सेवाओं के साथ जोड़ा है। डाक, पार्सल, लेटर्स को पहुँचाने के लिए एक्सप्रेस सेवाएँ शुरू की गई हैं। डाक घरों ने वित्तीय सेवाओं को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ा है। अब लोगों में ऑनलाइन पोस्टल के लेन-देन पर भी भरोसा बढ़ रहा है। आज दुनिया भर में 55 प्रकार की पोस्टल ई-सेवाएँ उपलब्ध हैं। डाक 77 फीसदी ऑनलाइन सेवाएँ दे रही है। 5 दिन के मानक समय के अंदर 83.62 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डाक सामग्री बाँटी जाती है। 142 देशों में पोस्टल कोड उपलब्ध है। भारत में स्वतंत्रता दिवस के दिन यानी 15 अगस्त, 1972 को पिनकोड नंबर की शुरुआत की गई। अभी भारतीय डाक विभाग पिनकोड नंबर (पोस्टल इंडेक्स नंबर) के आधार पर देश में डाक वितरण का काम करता है।

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