जानिए कौन हैं भारत के आधुनिक शांति दूत ‘पहलवानजी’, जिन्होंने 32 देशों में फहराया तिरंगा और दुनिया को दिया शांति का संदेश ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 17 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत हमेशा से ही विश्व शांति का पक्षधर रहा है और दुनिया में इसे विश्व शांति का पुरोधा भी कहा जाता है। क्योंकि यहीं से विश्व शांति की विचार धारा का उदय हुआ है और पूरी दुनिया में पहुँचा है। इस प्रकार हमारा देश दुनिया में एक शांति दूत की भूमिका में रहा है। भारत ने महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर सहित अनेक शांतिदूत दुनिया को दिये हैं। अब हम एक आधुनिक शांति दूत की बात कर रहे हैं, जो हैं देवभूमि उत्तराखंड के एक विश्व विख्यात रेसलर लाभांशु शर्मा, जिन्होंने दुनिया के 197 देशों में से 32 देशों की यात्रा सम्पन्न कर ली है और वहाँ भारतीय तिरंगा फहराते हुए विश्व शांति का संदेश पहुँचाया है। लाभांशु 100 देशों की यात्रा करने के लक्ष्य के साथ इस मिशन पर आगे बढ़ रहे हैं।

कौन हैं लाभांशु शर्मा और उनका भारतीय सेना से क्या संबंध ?

उत्तराखंड के ऋषिकेश में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे लाभांशु शर्मा सुरेश चंद्र शर्मा की सबसे छोटी संतान हैं। ‘पहलवानजी’ के नाम से पहचाने जाते लाभांशु शर्मा के पिता सुरेशचंद्र भी पहलवान रहे हैं। वे भारतीय सेना के पूर्व पहलवान हैं। जबकि लाभांशु की माँ आरती शर्मा दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। इस प्रकार लाभांशु को देशभक्ति और पहलवानी अपने पिता से विरासत में मिली है।

यही कारण है कि लाभांशु ने 14 वर्ष की उम्र से ही कुश्ती में अपने करियर की शुरुआत की थी। यह शुरुआत भी सामान्य नहीं थी, उन्होंने दिल्ली के नौ शेरा दंगल से कुश्ती करियर प्रारंभ किया, जो कि 150 साल पुरानी कुश्ती परंपरा है और दिल्ली में हर साल आयोजित होती है। लाभांशु ने 2012 में अपने प्रदेश उत्तराखंड में राज्य स्तरीय कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। इसके बाद उन्होंने भारत के नेशनल स्कूल गेम्स में प्रतिस्पर्धा के बाद पहला स्वर्ण पदक जीता था। लाभांशु ने राष्ट्रीय स्तर के मैचों में 7 स्वर्ण पदक जीते हैं और 2016-17 में उन्होंने एशियन इंटरनेशनल गेम्स और इंडो-नेपाल इंटरनेशनल रेसलिंग टूर्नामेंट में 120 किग्राम वर्ग में दो स्वर्ण पदक जीते हैं। उन्होंने 2017 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित हुए पहले केडी जाधव अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट में भी रजत पदक जीता है।

लाभांशु ने जॉर्जिया की राजधानी में 20 टन भारी ट्रक को खींचकर एक अनूठा विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया है, इसके बाद भारत के उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने उन्हें इस उपलब्धि के लिये बधाई दी थी। पीएम नरेन्द्र मोदी के हाथों 2015 में वे नेशनल ब्रेवरी अवॉर्ड से सम्मानित हो चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों से डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अवॉर्ड प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा उत्तराखंड रत्न, यंग अचीवर अवॉर्ड, नेशनल यूथ आइकन अवॉर्ड, राष्ट्रीय निर्माण अवॉर्ड तथा माँ भारती अवॉर्ड से भी अलंकृत हो चुके हैं।

इस प्रकार लाभांशु उन युवा और प्रेरणास्रोत खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं के प्रमुखों के हाथों से सम्मान प्राप्त हुए हैं। वे उत्तराखंड में प्रदेश के युवाओं को पहलवानी के गुर सिखाने के लिये रेसलिंग अकेडमी भी शुरू करना चाहते हैं।

लाभांशु शर्मा ने की विश्व यात्रा, दिया विश्व शांति का संदेश

आजकल पहलवानजी विश्व शांति और भाई चारे का संदेश प्रचारित करने के मिशन पर हैं। इसके लिये उन्होंने 2 अगस्त से 5 अक्टूबर तक 62 दिन के भीतर अपनी कार से 28,000 किलोमीटर की यात्रा की और 32 देशों में जाकर विश्व शांति का संदेश दिया। सड़क के रास्ते शांति का संदेश लिये वह इन देशों में भारतीय तिरंगे के साथ अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और अलग-अलग भाषा संस्कृति वाले लोगों से मिले। उनके साथ इस यात्रा में उनके पिता सुरेशचंद्र शर्मा और बड़े भाई विशाल शर्मा और उनके एक साथी भी शामिल हुए। 2 अगस्त को उनकी यात्रा ऋषिकेश से प्रारंभ हुई थी, जिसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हरी झंडी दिखा कर प्रस्थान कराया था। इसके बाद लाभांशु नेपाल, तिब्बत, चीन, उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान होते हुए रूस पहुँचे। वहाँ से लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, चेक रिपब्लिक, नॉर्वे, डेनमार्क, लक्सेमबर्ग, स्वीडन, जर्मनी, स्विटजरलैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, वेल्स, स्कॉटलैंड, आयरलैंड, इस्टोनिया, ग्रीस, इटली, फिनलैंड, पुर्तगाल, स्पेन और यूके की यात्रा की।

लाभांशु अपनी माँ को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। लाभांशु के अनुसार उन्होंने 11वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2011 में कुश्ती की शुरुआत की थी। पहली बार दिल्ली की जामा मस्जिद के अखाड़े में आयोजित हुए दंगल में उन्होंने भाग लिया था, जिसमें जीत भी हासिल की थी। इस जीत पर उन्हें 11 रुपये और एक बनियान पुरस्कार के रूप में मिले थे। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के ही छत्रसाल स्टेडियम में भारतीय पहलवान सुशील कुमार की देखरेख में पहलवानी की बारीकियाँ सीखी हैं। लाभांशु के अनुसार कई देशों में भारतीय राजदूतों ने उनका स्वागत किया, कई स्थानों पर उनके स्वागत के कार्यक्रम भी आयोजित हुए। यात्रा के दौरान वे विविध देशों में भारतीय समुदाय के लोगों से भी मिले। उनकी गाड़ी पर लहराता तिरंगा और गाड़ी की भारतीय नंबर प्लेट देख कर भारतीय लोग उनसे आकर्षित हो जाते थे और उनसे मिलने आते थे।

शांतिदूत पहलवानजी व्यसन मुक्ति मिशन भी चलाते हैं

पहलवानजी यानी लाभांशु शर्मा युवाओं के लिये नशा मुक्ति अभियान भी चलाते हैं। 2016 में इस अभियान के कारण ही उन्हें कुआलालंपुर में विश्व युवा सम्मेलन में भाग लेने के लिये आमंत्रित भी किया गया था, जहाँ उनके भाषण ने कई छात्रों को नशीली दवाइयों, शराब और तंबाकू प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से मुक्त होने के लिये प्रेरित किया।

सेना को वन रैंक वन पेंशन दिलाने में भी निभाई भूमिका

पहलवानजी ने पूर्व सैनिकों के लिये वन रैंक वन पेंशन योजना को मंजूरी देने के लिये पूर्व सैनिकों के समर्थन में सरकार पर दबाव बनाया था। इसके लिये पहलवानजी यानी लाभांशु शर्मा ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर पूर्व सैनिकों के साथ 3 दिन का उपवास भी किया था और पूर्व सैनिकों के आंदोलन के समर्थन में खुद को सरकार की ओर से मिले बहादुरी पुरस्कार व पदक भी सरकार को लौटा दिये थे। इस प्रकार पहलवानजी केवल कुश्ती के मैदान में ही प्रतिद्वंद्वियों से दो-दो हाथ नहीं करते, अपितु कई क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर अपना योगदान दे रहे हैं और अनूठी देश सेवा कर रहे हैं, जो देश के अन्य युवाओं के लिये भी प्रेरणादायी है।

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