VOTE KARO INDIA : किसी की हार-जीत ‘पक्की’ समझ कर मतदान नहीं करना कहीं ‘ऐतिहासिक’ भूल न बन जाए, वरना मिलेगी ‘अनचाही’ सरकार !

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सावधान ! अभी तो नई सरकार की केवल नींव पड़ी है, इमारत अब चार चरणों के मतदान से बनेगी, इसलिए सारे ‘भ्रम’ तोड़ कर VOTE KARO INDIA

विशेष रिपोर्ट : आई. के. शर्मा (मुख्य संपादक, YuvaPress.com)

लोकसभा चुनाव 2019 आज एक महत्वपूर्ण पड़ाव से गुज़र रहा है। आज चौथे चरण में 9 राज्यों की 72 लोकसभा सीटों के लिए मतदान हो रहा है, परंतु प्रारंभिक 3 चरणों के मतदान के बाद सोशल मीडिया सहित विभिन्न माध्यमों के जरिए यह ‘अफवाह’ फैलाई जा रही है कि फलाँ व्यक्ति ही प्रधानमंत्री बनने वाला है या फलाँ पार्टी ही जीतने वाली है। ऐसे में चौथे, पाँचवें, छठे और सातवें चरण के मतदाताओं से yuvapress.com यह अपील करता है कि किसी की हार-जीत पक्की हो जाने की अफवाह के भ्रम में न पड़ें और भारी मतदान करें।

शेष चरणों के मतदाता अपने चित्त में यह गाँठ बांध लें कि प्रथम तीन चरणों के मतदान में केवल नई सरकार की नींव पड़ी है। नई सरकार की इमारत का निर्माण अभी बाकी है और यह महान कार्य करने का उत्तरदायित्व शेष चार चरणों के राष्ट्रप्रेमी और लोकतंत्र के प्रहरी मतदाताओं पर आन पड़ा है। इसलिए VOTE KARO INDIA, वह भी अधिक से अधिक संख्या में। हम यह चेतावनी इसलिए दे रहे हैं कि क्योंकि किसी की हार-जीत पक्की हो गई समझने के भ्रम में यदि आपने मतदान करने में आलस्य किया, तो यह आलस्य आपको ऐसी ‘अनचाही’ सरकार देगा, जिसे आपको पाँच वर्षों तक झेलना होगा। तब आपके पास पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। इसलिए शेष चार चरणों में भी सभी मतदाता मतदान अवश्य करें। चाहें जिसे वोट दें, परंतु वोट अवश्य दें। आपका वोट ही नई सरकार की मज़बूत इमारत का निर्माण करेगा।

यह ‘ऐतिहासिक’ भूल न कर बैठिएगा

हम जब अधिक से अधिक मतदान करने की अपील कर रहे हैं, तब हमारा उद्देश्य केवल मतदान के प्रति लोगों को जागृत करने का है। न हम ये कह रहे हैं कि आप नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए वोट करें और न ही हम यह कह रहे हैं कि आप कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके साथ कतार में खड़े अनेक नेताओं में से किसी को नया प्रधानमंत्री बनने का अवसर देने के लिए वोट करें, क्योंकि वोट न करने वाले मतदाताओं के कारण से देश और वोट करने वाले मतदाताओं को भविष्य के ‘दुष्परिणाम’ भुगतने पड़ते हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। 15 वर्ष पहले के ही चुनाव को ले लीजिए, जब देश की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी सबसे लोकप्रिय नेता हुआ करते थे, परंतु लोकसभा चुनाव 2004 में वाजपेयी की जीत पक्की होने के भ्रम में पड़े मतदाताओं ने मतदान में आलस्य दिखाया और देश को एक ऐसी सरकार और एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला, जिसकी चुनाव से पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। इसलिए लोकसभा चुनाव 2019 में शेष चार चरणों के मतदाताओं से यह बार-बार अपील है कि वे 2004 जैसी ऐतिहासिक भूल करने की भूल न करें और मतदान अवश्य करें।

जब ‘भ्रम’ ने दिलाई ‘अनचाही’ सरकार

लोकसभा चुनाव 2004 के बाद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि देश को वाजपेयी के अतिरिक्त कोई ऐसा प्रधानमंत्री मिलेगा, जो गांधी परिवार से संबंध न रखता हो। 1998 से छह वर्ष तक सफलतापूर्वक काम करने वाली वाजपेयी सरकार जब लोकसभा चुनाव 2004 के रण में उतरी, तब कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष बिखरा हुआ था। वाजपेयी के मुकाबले विपक्षी खेमे के पास कोई चेहरा नहीं था। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी लोकप्रियता के पैमाने पर वाजपेयी के आगे कहीं ठहरने की स्थिति में नहीं थीं, तो वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी नए-नए राजनीति में आए थे। शेष विपक्ष में तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों के चेहरों की वैसी ही भरमार थी, जैसी आज है। ऐसे में भाजपा-एनडीए वाजपेयी के काम और नाम पर जीत पक्की समझ रहा था। तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों ने वाजपेयी सरकार की वापसी की भविष्यवाणी कर रखी थी। एक तरफ भाजपा-एनडीए का अति आत्मविश्वास और दूसरी तरफ आम मतदाताओं का यह भ्रम कि वाजपेयी सरकार की वापसी तय है। इन दोनों के चलते करोड़ों मतदाता यह सोच कर वोट करने के लिए घरों से ही नहीं निकले कि हम वोट नहीं करेंगे, तो भी भाजपा-एनडीए की जीत पक्की है। इसी कारण 2004 में कम मतदान हुआ और वाजपेयी सरकार को मतदाताओं के भ्रम के कारण जाना पड़ा। ये आलसी मतदाता वोट न करने की भूल को उस समय और न्यायोचित मानने लगे, जब मतदान के बाद आए तमाम EXIT POLLS में भी वाजपेयी सरकार की वापसी का निष्कर्ष दिया गया, परंतु परिणाम आते ही पता चल गया कि वोट न करने वाले मतदाता वोट करने वाले मतदाताओं पर भारी पड़े और देश को एक ‘अनचाही’ यूपीए सरकार और अकल्पनीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह मिले। मनमोहन सिंह 10 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे। हम ये नहीं कह रहे कि उन्होंने अच्छे काम नहीं किए, परंतु आलसी मतदाताओं के कारण देश को वाजपेयी जैसा कुशल और उत्तम प्रधानमंत्री गँवाना पड़ा।

तीन चरणों के बाद क्यों बदली कुछ नेताओं की बोली ?

आइए अब 2004 की तुलना 2019 से करते हैं। तीन चरणों के मतदान के बाद सोशल मीडिया और कुछ नेताओं की तरफ से जान-बूझ कर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि फलाँ व्यक्ति ही प्रधानमंत्री बनने वाला है। उनके इस भ्रम फैलाने के पीछे कारण स्पष्ट है कि वे 2004 जैसी स्थिति का निर्माण करना चाहते हैं, ताकि लोग भ्रम में रह कर मतदान न करें और इसका फायदा इन नेताओं को मिल जाए। आश्चर्य और संदेह इसलिए भी होता है, क्योंकि किसी नेता विशेष की जीत पक्की होने का भ्रम फैलाने वालों में ऐसे-ऐसे दिग्गज शामिल हैं, जो उस नेता विशेष के धुर विरोधी हैं। क्या कोई नेता अपने विरोधी की जीत पक्की होने का दावा कर सकता है ? यदि करता है, तो स्पष्ट है कि वह मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा है। इसीलिए शेष चार चरणों के तमाम मतदाताओं से पुनः-पुनः करबद्ध निवेदन है कि वे तीन चरणों से भी अधिक मतदान शेष चार चरणों में करें और एक मज़बूत सरकार की मज़बूत इमारत का निर्माण करें।

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