मिलिए भारत की ‘ब्रिटिश मीरा’ से : पाश्चात्य भौतिकवादी संस्कृति की घोर विरोधी थीं एनी बेसेंट

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 1 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ इन शब्दों की रचना करने वाली मीराबाई आजीवन अपने मोहन यानी भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में आकंठ डूबी रहीं। मीराबाई (1498-1564) कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री थीं। उनकी कविताओं में सदैव वैदिक-सनातन धर्म की परम्परा झलकती थी, जो कृष्ण-भक्ति के रंग में रंग कर और गहरी हो जाती है। मीराबाई बचपन से ही कृष्ण-भक्त थीं, उनकी पूजा-अर्चना और भगवान कृष्ण की मूर्ति के सामने घंटों नृत्य करते हुए कृष्ण के भजनों को गाना उन्हें अत्यन्त पसंद था। युवावस्था में आने पर उनका विवाह उदयपुर के राजा महाराणा भोजराज के साथ हुआ था। शादी के कुछ दिन बाद ही उनके पति की मृत्यु हो गई और मीरा को पति के शव के साथ सती होने पर विवश किया गया, परंतु मीरा ने इस रूढ़िवादी परंपरा को मानने से इनकार कर दिया। अब वह अपना सारा समय भजन-कीर्तन और साधु-संतों के साथ बिताने लगीं थी। कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति दिन प्रति दिन बढ़ती गई। कृष्ण-प्रेम में मग्न मीरा कृष्ण मंदिरों में नाचने-गाने लगीं थी। मीरा का नाचना, उनके परिवार को पसंद नहीं था और उनके परिवार ने ही विष देकर उन्हें मारना चाहा। इतनी विषम परिस्थितियों के बाद भी मीरा ने कृष्ण-भक्ति की राह नहीं छोड़ी। वह सदैव सनातन धर्म और कृष्ण-भक्ति में ही लीन रहीं। आज हम आपको भारत की इन मीराबाई से नहीं, अपितु एक ब्रिटिश मीरा से मिलवाने जा रहे हैं, जिन पर भले ही भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा प्रभाव तो नहीं था, परंतु इतना प्रभाव तो अवश्य था कि उन्हें अपनी ही पाश्चात्य भौतिकवादी संस्कृति से भारी नफरत हो गई थी। उनका नाम था डॉ. एनी वुड बेसेंट (Dr. Annie Wood Besant)।

एनी बेसेंट एक अग्रगण्य आध्यात्मिक, थियोसोफिस्ट, महिलाओं की समर्थक, लेखक, प्रभावी वक्ता थीं और भारत से बेहद प्रेम करती थीं। ‘कर्म’ को ही अपना मूल मंत्र मानने वाली एनी बेसेंट भारत की स्वतंत्रता के लिये अपना बलिदान देने को भी सदैव तत्पर थीं। एनी बेसेंट आधुनिक भारत में पाश्चात्य संस्कृति और भौतिकवाद से घिरे उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक हैं, जिन्हें अपनी ही भारतीय संस्कृति की महानता का ज्ञान नहीं है और वे विदेशी लोगों, विदेशी संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हैं। आज हम एनी बेसेंट को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 172वीं जयंती है। आइए जानते हैं एनी बेसेंट विदेशी मूल की होने के बाद भी भारतीय संस्कृति से इतनी प्रभावित क्यों थीं ?

माता-पिता के धार्मिक विचारों से थीं प्रभावित

एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर, 1847 को लंदन के कलफम में हुआ था। उनके पिता अंग्रेज थे। एनी बेसेंट के पिता डॉक्टर होने के बाद भी दर्शन और गणित में रुचि रखते थे। एनी बेसेंट पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव था। एनी बेसेंट जब 5 वर्ष की थीं, तब ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। धन के अभाव में माता ने हैरो उन्हें पढ़ने के लिए भेज दिया था। जहाँ उन्होंने मिस मेरियट के संरक्षण में फ्राँस और जर्मनी में पढ़ाई की और कई देशों की भाषाएँ सीखी। 17 वर्ष की आयु में वह माता के पास लौट आईं और उनके साथ ही रहने लगीं। इसी दौरान उनकी भेंट एक युवा पादरी रेवरेण्ड फ्रेंक से हुई और 1867 में दोनों का विवाह हो गया। एनी के पति संकुचित विचारों वाले थे। वहीं एनी एक असाधारण व्यक्तित्व से संपन्न स्वतंत्र विचारों वाली आत्मविश्वासी महिला थीं। पति के विचारों से असामनता के चलते उनके दाम्पत्य जीवन में उथल-पुथल मच गई। तब तक एनी बेसेंट 2 बच्चों की माँ बन चुकीं थीं, परंतु इसके बाद भी पति से उनके संबंध बिगड़ते चले गये। ईश्वर, बाइबल और इसाई धर्म से उनकी आस्था डगमगा गई। पादरी-पति और पत्नी का परस्पर निर्वाह कठिन हो गया और अन्ततोगत्वा 1874 में उनका सम्बन्ध-विच्छेद हो गया।

एनी बेसेंट संदेहवादी को छोड़कर बनी ईश्वरवादी

पति से अलग होने के बाद एनी बेसेंट को गम्भीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और उन्होंने स्वतंत्र विचार संबंधी लेख लिख कर धनोपार्जन करना शुरू किया। इसी दौरान एनी बेसेंट चार्ल्स व्रेडला के सम्पर्क में आईं। उनसे मिलने के बाद से वह सन्देहवादी के स्थान पर ईश्वरवादी हो गईं। कुछ समय बाद उनके पति ने कानून की सहायता से उनके दोनों बच्चों को उनसे अलग कर दिया, जिससे उन्हें हार्दिक कष्ट हुआ और उन्होंने कानून की निन्दा करते हुए लिखा, ‘यह अत्यन्त अमानवीय कानून है, जिसने बच्चों को उनकी माँ से अलग कर दिया। मैं अपने दु:खों का निवारण दूसरों के दु:ख दूर करके करूँगी और सभी अनाथ और असहाय बच्चों की माँ बनूँगी।’ बच्चों के जाने के बाद एनी ने अब अपना जीवन दीन-हीन अनाथ बच्चों की देख-भाल में समर्पित कर दिया। इसी दौरान उनकी भेंट महान् ख्याति प्राप्त पत्रकार विलियन स्टीड से हुई, उनके सम्पर्क में आने के बाद वे लेखन एवं प्रकाशन के कार्य में और अधिक रुचि लेने लगीं। इसी के साथ वे अपना अधिकांश समय मजदूरों, अकाल पीड़ितों तथा झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों को सुविधाएँ दिलाने में व्यतीत करने लगीं। वह कई वर्षों तक इंग्लैण्ड की सर्वाधिक शक्तिशाली महिला ट्रेड यूनियन की सेक्रेटरी भी रहीं। वे अपने ज्ञान एवं शक्ति को सेवा के माध्यम से चारों ओर फैलाने को नितान्त आवश्यक समझती थीं। उनका विचार था कि बिना स्वतंत्र विचारों के सत्य की खोज संभव नहीं है।

भारत को बनाया थियोसोफी गतिविधियों का केंद्र

1878 में उन्होंने सर्वप्रथम भारतवर्ष के बारे में अपने विचार प्रकट किये। उनके लेख तथा विचारों ने भारतीयों के मन में उनके प्रति स्नेह उत्पन्न कर दिया। अब वे भारतीयों के बीच कार्य करने के बारे में दिन-रात सोचने लगीं। 1883 में वे समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुईं और ‘सोसलिस्ट डिफेन्स संगठन’ नाम की संस्था स्थापित की। इसके बाद 1889 में एनी बेसेंट एक अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था थियोसॉफिकल सोसाइटी (Theosophical Society)  से प्रभावित हुईं। ‘थियोसोफी ग्रीक भाषा के दो शब्दों “थियोस” तथा “सोफिया” से मिल कर बना है, जिसका अर्थ हिंदू धर्म की “ब्रह्मविद्या”, इसाई धर्म के ‘नोस्टिसिज्म’ अथवा इस्लाम धर्म के “सूफीज्म” से था। उनके अन्दर एक शक्तिशाली अद्वितीय और विलक्षण भाषण देने की कला निहित थी। अत: बहुत शीघ्र उन्होंने अपने लिये थियोसोफिकल सोसायटी में एक प्रमुख वक्ता के रूप में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। उन्होंने आजीवन सम्पूर्ण विश्व को थियोसोफी की शाखाओं के माध्यम से एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। 1893 में वे भारत आईं और उन्होंने भारत को थियोसोफी की गतिविधियों का केन्द्र बनाया। उन्होंने अपना अधिकांश समय वाराणसी में बिताया था।

वे भारतीय वर्ण व्यवस्था की प्रशंसक थीं और इसे व्यवहारिक बनाने के लिये उन्होंने शिक्षा में धार्मिक शिक्षा का समावेश किया था। साथ ही उन्होंने 1898 में वाराणसी में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की थी। सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जाति व्यवस्था, विधवा विवाह, विदेश यात्रा आदि को दूर करने के लिये उन्होंने ‘ब्रदर्स ऑफ सर्विस’ नामक संस्था का गठन किया था। एनी बेसेंट स्वभावतः धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। उनके राजनीतिक विचार की आधारशिला भी उनके आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य ही थे। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण बिना अध्यात्म के संभव नहीं हो सकता। राष्ट्र का निर्माण एवं विकास तभी सम्भव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। एनी बेसेंट का उद्देश्य हिन्दू समाज और उसकी आध्यात्मिकता में आयी विकृतियों को दूर करना था। उन्होंने भारतीय पुनर्जन्म में विश्वास करना शुरू किया। वह मानती थीं कि वह पिछले जन्म में हिन्दू ही थीं। वह धर्म और विज्ञान को एक ही मानती थीं। उन्होंने भारतीय धर्म का गम्भीर अध्ययन किया और भगवद्गीता का अनुवाद ‘थॉट्स ऑन दी स्टडी ऑफ दी भगवद्गीता’  के नाम से किया। उन्होंने बौद्धिक विकास को प्रोत्साहन दिया। वे मानती थीं कि विश्व का मार्ग दर्शन करने की क्षमता केवल भारत में ही निहित है। वे सदियों से चले आ रहे अन्ध विश्वासों से ग्रस्त मानव जाति को उनसे मुक्त करना चाहती थीं।

वे 1907 में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्षा के रूप में निर्वाचित हुईं थी। उन्होंने पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता की कड़ी आलोचना करते हुए प्राचीन हिन्दू सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध किया था। धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य प्रारम्भ किया था। भारत के लिये राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है, इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने ‘होमरूल आन्दोलन’ का नेतृत्व किया था। 20 जनवरी, 1961 को वे ब्रह्मलीन हो गईं। आजीवन वाराणसी को ही हृदय से अपना घर मानने वाली बेसेंट की अस्थियाँ वाराणसी लाई गयीं थी और शान्ति-कुंज से निकले एक विशाल जन-समूह ने उन अवशेषों को ससम्मान सुरसरि को समर्पित किया था।

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