VIDEO : ये भारत की बेटी दुनिया के लिये बनी नज़ीर : किंजल शाह की ‘श्वास’ ने महकाई 650 बच्चों की ज़िंदगी

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 15 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। कहते हैं कि दुनिया बदलने के लिये बस एक कदम भर उठाना होता है। मुश्किल होता है तो कदम उठाने का दृढ़ संकल्प करना। यदि संकल्प दृढ़ हो तो मुश्किलें ही राह बना कर देने लगती हैं। ऐसा ही दृढ़ संकल्प किया भारत की एक युवा और उत्साही बेटी किंजल शाह ने। किंजल शाह के एक कदम ने वंचित वर्ग के 650 बच्चों का जीवन बदल दिया। अब किंजल दुनिया के लिये एक नज़ीर बन चुकी है।

कौन हैं किंजल शाह ?

अहमदाबाद के अत्यंत पोश इलाके सैटेलाइट में श्यामल क्रॉस रोड के पास रहने वाली किंजल शाह नामक लड़की अपने अपनी और अपने माता-पिता की इच्छा से शहर के एक कॉलेज से बायो-मेडिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी। पढ़ाई के दूसरे वर्ष में ही उसके जहन में एक क्रांतिकारी विचार ने जन्म लिया और वह वंचित वर्ग के उन गरीब बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता करने लगी जो गरीब बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहते थे और स्कूल नहीं जाते थे अथवा जिनके माता-पिता आर्थिक रूप से इतने भी सक्षम नहीं थे कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भी पढ़ा सकें। कुछ अभिभावकों ने तो अपने बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा दी थी, ताकि वे कामकाज में माता-पिता का हाथ बँटा सकें। ऐसे बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें अच्छी शिक्षा दिला कर समाज की मुख्य धारा में लाने के विचार को किंजल ने अपने मित्रों के साथ शेयर किया और कुछ मित्रों के साथ मिल कर गरीब बच्चों को इवनिंग क्लास लगा कर पढ़ाने का बीड़ा उठाया।

शुरुआत 6 से 8 बच्चों के साथ हुई। पहले इन बच्चों में और उनके माता-पिता में विश्वास जगाने की चुनौती थी, क्योंकि जब किंजल और उसके मित्र बच्चों से संपर्क करते तो उनके माता-पिता चिंतित हो उठते कि कहीं ये लोग उनके नौनिहालों को बहला-फुसला कर उठा न ले जाएँ ! बा-मुश्किल बच्चों और उनके अभिभावकों में विश्वास जागा तो शुरुआत में इन बच्चों को किंजल और उनके दोस्त सप्ताह में दो दिन शनिवार और रविवार को इवनिंग क्लास में एक-दो घण्टे पढ़ाते थे। उनमें पढ़ाई के प्रति रुचि जगाने के लिये कभी उनसे चित्र बनवाते थे तो कभी अन्य प्रवृत्तियाँ करवाते थे। जब उनके साथ जुड़ने वाले बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि जागी तथा उनकी संख्या बढ़ने लगी तो उन्होंने एक सरकारी पाठशाला के शिक्षकों से बात की। उन्होंने पाठशाला का समय समाप्त होने के बाद उस पाठशाला में एक्स्ट्रा क्लास लगाने की अनुमति दी। किंजल और उनके मित्रों का अभियान आगे बढ़ने लगा। इस बीच किंजल ने अभिभावकों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिये भी मनाया और उनकी पढ़ाई का खर्च भी उठाया। इसके लिये किंजल और उसके मित्रों ने शुरुआती दौर में अपने परिवार और रिश्तेदारों के अलावा पड़ोसियों तथा परिचितों से फंड उगाया। सेवाभावी लोग भी उनके सेवायज्ञ में आहुति देने लगे और बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ने लगी तो उन्होंने शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में सेंटर शुरू किये।

नौकरी छोड़ कर बच्चों के लिये जीवन समर्पित किया

इस बीच किंजल अपनी बायो-मेडिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके नौकरी करने लगी थी। 2008 में शुरू हुई उनकी मुहिम वर्ष दर वर्ष सफलता के नये आयाम हासिल करने लगी थी, जिससे उत्साहित किंजल और उनके दोस्तों ने सप्ताह में दो दिन की बजाय प्रति दिन बच्चों को पढ़ाने का निर्णय किया। उनके पढ़ाए बच्चे परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने लगे तो उनका उत्साह और बढ़ा। अब किंजल के लिये नौकरी के साथ इतनी बड़ी तादाद में बच्चों को पढ़ाना मुश्किल होने लगा था, तब किंजल ने एक और बड़ा कदम उठाया। उन्होंने माता-पिता के विरोध के बीच अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरा जीवन बच्चों का भविष्य बनाने के लिये समर्पित कर दिया। ऐसे समय में जब वर्तमान मॉडर्न युवाओं के पास अपने परिवार को देने के लिये समय नहीं है, किंजल ने अनजान लोगों के बच्चों के भविष्य के लिये अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय करके दुनिया के लिये एक नज़ीर पेश की है।

‘SHWAS-BREATHE LIFE INTO’ ट्रस्ट की नींव रखी

2013 में किंजल और उसके मित्रों ने मिल कर ‘श्वास-प्राण फूँक दो (SHWAS-BREATHE LIFE INTO)’ चेरीटेबल ट्रस्ट की नींव रखी। इस ट्रस्ट के अंतर्गत किंजल और उसके मित्र समाजसेवियों और सेवाभावी लोगों से बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिये चंदा एकत्र करने लगे और ट्रस्ट के बैनर तले जगह किराये पर लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में सेंटर कार्यरत किये गये। ट्रस्ट द्वारा इन सेंटर्स की देखभाल और रखरखाव किया जाता है तथा बच्चों को पढ़ाने के लिये कुछ शिक्षक भी रखे गये हैं। बच्चे और शिक्षक समय पर आते हैं या नहीं, इसकी निगरानी के लिये एक सुपरवाइज़र भी नियुक्त किया गया है। किंजल अब बच्चों के लिये इस ट्रस्ट के अंतर्गत चंदा एकत्र करने की जिम्मेदारी सँभालती हैं। 11 वर्ष के बाद 2019 में उनके सेंटर्स की संख्या 11 हो चुकी है। इनमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी 650 तक पहुँच चुकी है।

अनपढ़ महिला को पढ़ा कर बनाया शिक्षक

इस बीच अपने बच्चे को पढ़ने के लिये सेंटर में लाने ले जाने वाली एक गरीब महिला जो लोगों के घरों में काम करती थी और खुद भी अनपढ़ थी, उसे भी पढ़ने की इच्छा जागी तो किंजल की मदद मिलने पर उसने भी पढ़ना-लिखना सीख लिया और अब वह इतनी काबिल हो गई कि किंजल ने उसे भी शिक्षक के रूप में कक्षा 1 व 2 के बच्चों को पढ़ाने के लिये नियुक्त किया है। शिक्षक बन कर यह महिला भी अत्यंत उत्साहित है और अपनी सफलता का श्रेय किंजल को देती है।

मेधावी छात्रों को प्राइवेट स्कूलों में दिलाया दाखिला

तत्पश्चात किंजल ने बच्चों का कौशल निखारने के लिये आगे सोचा और फंड की मदद मिलने से कुछ मेधावी बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिलाया, जिनका खर्च किंजल की मदद से कुछ सेवाभावी लोग या कॉर्पोरेट हाउस उठा रहे हैं। इतना ही नहीं, किंजल की मदद से कुछ बच्चे अब कॉलेज में पढ़ रहे हैं और समाज के अन्य बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाने के योग्य बन गये हैं। इस सफलता के लिये ये बच्चे भी किंजल को ही श्रेय देते हैं। इस प्रकार किंजल के एक कदम ने 650 बच्चों का जीवन बदल दिया है। किंजल इन बच्चों को दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलना सिखा रही हैं और इसके लिये बच्चों को अंग्रेजी तथा कंप्यूटर की शिक्षा दिला रही हैं। साथ ही उन्हें विविध स्थलों की सैर करवा कर उन स्थलों की जानकारी मुहैया करवाती हैं तथा विविध प्रकार की प्रवृत्तियाँ आयोजित करके उनकी सुषुप्त शक्तियों को बाहर लाने के प्रयास कर रही हैं, ताकि ये बच्चे भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों में आत्म निर्भर बन कर अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर ऊँचा ला सकें।

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