वीर अब्दुल हमीद, जिन्होंने पाकिस्तान के अभेद्य अमेरिकी पैटन टैंकों को ‘खिलौनों’ से ‘खिलौनों’ की तरह उड़ाया…

* अब्दुल हमीद ने सिद्ध कर दिखाया, ‘साधन नहीं, साहस के बलबूते जीते जाते हैं युद्ध’

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 2 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार है और अधिकांशत: इस अलंकरण का वही वरण कर पाता है, जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए बलिदान का वरण कर लिया हो। बहुत कम मामलों में किसी जवान को परमवीर चक्र जीते-जी मिलता है। ऐसे ही एक परमवीर चक्र विजेता का नाम है अब्दुल हमीद। वैसे अब्दुल हमीद का स्मरण करने के लिए आज कोई विशेष अवसर नहीं है, परंतु राष्ट्र की रक्षा पर बलि चढ़ने वाले वीरों की शूरवीरता के किस्से तो कभी भी कहे-सुनाए जा सकते हैं, जो आधुनिक भावी पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं।

अब्दुल हमीद भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 के दौरान पंजाब में तरनतारन स्थित आसल उत्ताड़ में 8 से 10 सितंबर, 1965 को हुए भीषण युद्ध के नायक थे। अब्दुल हमीद की बहादुरी को यदि समझना है, तो आप अभिनंदन वर्तमान को याद कर सकते हैं, जिन्होंने भारत के पुरानी पीढ़ी के मिग 21 विमान से पाकिस्तान के अमेरिका निर्मित अत्याधुनिक एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था। अब्दुल हमीद भी आसल उत्ताड़ युद्ध में एक ऐसे ही योद्धा थे, जिन्होंने पाकिस्तान के अभेद्य-अत्याधुनिक अमेरिका निर्मित पैटन टैंकों को खिलौनों की तरह ध्वस्त किया था और वह भी साधारण थ्री नॉय थ्री राइफल तथा लाइस मशीन गन (LMG) के साथ, जो पैटन टैंकों के आगे साधारण खिलौनों के समान थीं। यद्यपि माँ भारती की रक्षा करते हुए अब्दुल हमीद शहीद हो गए थे, परंतु अपने प्राणों की आहूति देने से पहले अब्दुल हमीद ने अभेद्य पैटन टैंकों को भारी नुकसान पहुँचा कर पाकिस्तानी सेना के बुलंद हौसलों को धूल-धूसरित कर दिया था।

‘मेरा गाँव मेरा देश’ की भावना से ओतप्रोत

आप सोच रहे होंगे कि ये अब्दुल हमीद कौन थे। ? बॉलीवुड फिल्म ‘मेरा गाँव मेरा देश’ की कहानी में कदाचित नायक द्वारा अपने गाँव को ही अपना देश मान कर उसकी भलाई के लिए सब कुछ करते दिखाया होगा, परंतु अब्दुल हमीद के लिए केवल गाँव ही नहीं, देश भी बहुत कुछ था। उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ीपुर जिले के धरमपुर गाँव में मुस्लिम दर्जी (जुलाहा) परिवार में 1 जुलाई, 1933 को मोहम्मद उस्मान के यहाँ जन्मे अब्दुल हमीद की रुचि अपने पारिवारिक कामकाज में नहीं थी। पिता मोहम्मद उस्मान की कुश्ती में भी दिलचस्पी थी, जो अब्दुल हमीद को भी रास आई। लाठी चलाना, कुश्ती का अभ्यास करना, उफनती नदी को पार करना, गुलेल से निशाना लगाना… इन सभी ग्रामीण बाल्य कलाओं में अब्दुल हमीद पारंगत थे और उनका एक सर्वोपरि सद्गुण था दूसरों की सहायता के प्रति नित्य तत्परता। अन्याय सहना उनके लहु में नहीं था। इसीलिए गांव में एक दिन जब ज़मींदार के 50 गुंडे ग़रीब किसानों की फसल लूटने के लिए पहुँचे, तो हमीद ने उन्हें ललकारा और लुटेरों-गुंडों को खाली हाथ लौटना पड़ा। हमीद ने एक बार बाढ़ के दौरान नदी में डूबती दो युवतियों के प्राण भी बचाए, परंतु अब्दुल हमीद की बहादुर के कारनामे धरमपुर तक सीमित कहाँ रहने वाले थे ? हमीद जब 21 वर्ष के हुए, तो रेलवे में भर्ती होने के लिए गए, परंतु उन्हें तो मानो माँ भारती पुकार रही थी। वे तो सेना में भर्ती होना चाहते थे। 1954 में उन्हें यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई और 27 दिसम्बर, 1954 को अब्दुल हमीद को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल कर लिया गया।

भाई ने बताई ‘चक्र’ की महानता और सपना हुआ साकार

सेना में शामिल होने के बाद अब्दुल हमीद जम्मू-कश्मीर में तैनात किए गए। यहाँ वे न केवल पाकिस्तानी घुसपैठियों की अच्छे-से ख़बर लेते, अपितु उन्हें जम कर मज़ा चखाते थे। इसी पराक्रमी स्वभाव के चलते हमीद ने कुख्यात आतंकवादी डाकू इनायत अली को पकड़वाया, जिसके फलस्वरूप उन्हें प्रमोशन के साथ लांस नायक बनाया गया। उनका अरमान था कोई विशेष पराक्रम करते हुए शत्रु को मार गिराना। भारत-चीन युद्ध 1962 के दौरान हमीद नेफा में तैनात थे, परंतु उन्हें यह पराक्रम करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। तीन साल बाद ही वह घड़ी आ गई, जब हमीद के अरमान पूरे होने वाले थे। वह घड़ी थी भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 की। हमीद की बटालियन को पंजाब में तरनतारन स्थित आसल उत्ताड़ (ASAL UTTAR) मोर्चे पर भेजा गया। मोर्चे पर जाने से पूर्व उनके भाई के कबे शब्द उनके जेहन में थे। हमीद के भाई ने कहा था, ‘पल्टन में उनकी बहुत इज्ज़त होती है, जिनके पास कोई चक्र होता है, देखना झुन्नन (हमीद) हम जंग में लड़ कर कोई न कोई चक्र ज़रूर लेकर लौटेंगे।’ भाई की भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई और अब्दुल हमीद ने आसल उत्ताड़ युद्ध में ऐसा कारनामा किया कि उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

खिलौनों से खिलौनों की तरह उड़ाए अभेद्य पैटन टैंक

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 में आसल उत्ताड़ का युद्ध सबसे बड़ा टैंक युद्ध था। पाकिस्तानी सेना ने 8 सितंबर, 1965 को अपने पैदल सेना और अमेरिकन पैटन टैंकों के साथ आसल उत्ताड़ मोर्चे पर धावा बोल दिया। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय सीमा के 5 किलोमीटर अंदर स्थित खेमकरण पर कब्ज़ा कर लिया। भारतीय सेना ने मुँहतोड़ जवाब दिया और 3 दिन के भीतर ही भारी हानि के साथ खेमकरण से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। इस युद्ध की विशेषता और भारतीय सेना की शूरवीरता यह थी कि पाकिस्तानी सेना पैटन टैंकों से सज्ज थी, जबकि भारतीय सैनिक गन माउंटेड जीप और मशीनगन जैसे पुरानी पीढ़ी के हथियारों से सामना कर रही थी। 10 सितंबर, 1965 को जब पाकिस्तानी सेना ने अमृतसर को नियंत्रण में लेने की तैयारी की, तो हमीद ने पाकिस्तानी अभेद्य टैंकों का अपनी तोप युक्त जीप को टीले के समीप ला खड़ा किया। गोले बरसाते हुए शत्रु के तीन टैंकों को अब्दुल हमीद ने मशीनगन से ध्वस्त कर दिया। अत्याधुनिक पैटन टैंकों को यूँ धूमिल होते हुए देख पाकिस्तानी सेना आश्चर्य के साथ क्रुद्ध हुई और उसके निशाने पर टैंकों को ध्वस्त कर रहे हमीद आ गए। पाकिस्तानी सेना ने हमीद को घेर कर उन पर गोलों की बरसात शुरू कर दी, परंतु वीरभूमि पर वीरगति को प्राप्त होने से पूर्व वीर अब्दुल हमीद ने गन माउंटेड जीप से 7 पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया और अंतत: शहीद हो गए। आसल उत्ताड़ गाँव में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी टैंकों की ऐसी तबाही मचाई कि देखते ही देखते आसल उत्ताड़ गांव पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया। तीन दिनों में ही पाकिस्तानी सेना पीछे हट गई और आसल उत्ताड़ युद्ध भारत की जीत के साथ समाप्त हो गया।

परमवीर चक्र विजेता बने वीर अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद 32 वर्ष की आयु में ही शहीद हो गए, परंतु उनकी वीरता की गाथा आज भी गाई-सुनाई जाती है। हमीद ने अपना नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से अंकित कराया और संदेश भी दिया कि केवल साधनों के बलबूते पर नहीं, अपितु साहस के बलबूते पर युद्ध जीते जाते हैं। अपने भाई से मिली प्रेरणा को उन्होंने पूर्ण किया। भारत सरकार ने अब्दुल हमीद को सबसे बड़े सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया, जो उनकी ओर से उनकी पत्नी रसूली बीबी ने प्राप्त किया। इतना ही नहीं, भारत सरकार ने अब्दुल हमीद को समर सेवा पदक, सैन्य सेवा पदक और रक्षा पदक भी प्रदान किए। भारतीय डाक विभाग ने भी 28 जनवरी, 2000 को वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पाँच डाक टिकट के सेट में 3 रुपए का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया, जिस पर अब्दुल हमीद भी थे। सेना की चौथी ग्रेनेडियर्स ने हमीद की स्मृति में उनकी क़ब्र पर एक समाधि का निर्माण किया, जहाँ हर वर्ष उनकी शहादत के दिन मेले का आयोजन किया जाता है। सैन्य डाक सेवा ने 10 सितंबर, 1979 को हमीद के सम्मान में एक विशेष अनावरण भी जारी किया।

हमीद की आरसीएल गन सार्वजनिक

गत 10 सितंबर, 2017 को वीर अब्दुल हमीद के 52वें बलिदान दिवस पर ग़ाज़ीपुर स्थित पार्क में वह गन जनता के अवलोकनार्थ सार्वजनिक रूप से रखी गई, जिस गन से हमीद ने पाकिस्तान के अमेरिकन पैटन टैंकों को नष्ट किया था। हमीद ने इसी आरसीेल गन से अमेरिकन पैटन टैंकों को धूल चटाई थी। महज़ 11 इंच की मोटाई वाली आरसीएल गन होने के बावजूद हमीद ने अपनी जान की परवाह किए बिना पैटन टैंकों को उड़ा कर आसल उत्ताड़ युद्ध में स्वयं को महान योद्धा सिद्ध किया था। लोगों ने पैटन टैंक व आरसीएल गन के बारे में सुना तो बहुत था, परंतु इसे देखने का कभी मौका नहीं मिला था। 10 सितंबर, 2017 को जब इसे सार्वजनिक किया गया, तो इसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी। वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी की ही यह ख्वाहिश थी कि जिस गन से उनके सरताज (पति) ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे, उसे यहाँ पार्क में रखा जाए। रसूलन बीबी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए सेना और प्रशासन ने 5 सितंबर, 2017 को कड़ी सुरक्षा में यह गन जबलपुर से हमीद पार्क गाजीपुर पहुँचाई थी। वीर अब्दुल हमीद के पौत्र जमील अहमद के अनुसार इस गन को लाने के लिए आर्मी के अधिकारियों के साथ बाकायदा लिखा-पढ़ी की गई। इसे यहाँ के लिए पास कराया गया है, अब यह गन यहीं रहेगी। इसे लाने का मक़सद यह कि युवा इससे प्रेरणा लें।

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