मिलिए ! IAS प्रांजल पाटिल से, जिन्होंने अपनी ‘दृष्टि बाधा’ को नहीं बनने दिया मार्ग में बाधक

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 14 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। जीवन में बड़ी से बड़ी बाधा आने के बाद भी जो व्यक्ति अपनी हिम्मत नहीं हारते, उन्हें ईश्वर आगे आकर सहारा देते हैं। ऐसी ही कभी हार ना मानने वाली और अपनी कमियों को भी अपना हथियार बनाकर अपने लक्ष्य को भेदने वाली एक साहसी युवती है प्रांजल पाटिल। प्रांजल यानी साफ और स्पष्ट। अपने नाम की तरह ही प्रांजल का लक्ष्य भी साफ और स्पष्ट था। उन्हें एक IAS बनना था। प्रांजल ने अपनी दिव्यांगता को मात देते हुए वह कारनामा कर दिखाया, जो एक नेत्रहीन व्यक्ति के लिये असंभव-सा लगता है। प्रांजल ने साबित कर दिया कि जहाँ दृढ़ निश्चय होता है, वहाँ हर बाधा विफल हो जाती है। 26 वर्षीय प्रांजल पाटिल ने अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा अपनी नेत्रहीनता को पार कर 2017 में संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) UPSC की परीक्षा में 124वीं रैंक प्राप्त की और भारत की पहली नेत्रहीन महिला सिविल सेवा (Indian Administrative Service) IAS अधिकारी बनीं। प्रांजल को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम् के एरनाकुलम् का जिला उप अधिकारी नियुक्त किया गया है।

6 वर्ष की उम्र में चली गई थी आँखों की रोशनी

मुंबई के उल्हासनगर की रहने वाली प्रांजल को बचपन से ही कम दिखाई देने की शिकायत थी, जब वे 6 वर्ष की हुईं, तो उनकी आँखों की रेटिना में कुछ ऐसी कमियाँ आ गईँ, जिसके चलते उन्हें दिखाई देना बंद हो गया। अपने जीवन के इतने बड़े दुःख से प्रांजल ने स्वयं को निराश नहीं होने दिया और दुगुनी ताकत के साथ वे फिर से उठ खड़ी हुईं। प्रांजल ने मुबंई के दादर स्थित श्रीमती कमला मेहता स्कूल से पढ़ाई की। यह स्कूल प्रांजल जैसे खास बच्चों के लिये ही है। यहाँ पढ़ाई ब्रेल लिपि में होती है। प्रांजल ने यहाँ से 10वीं तक पढ़ाई की। फिर चंदाबाई कॉलेज से आर्ट्स में 12वीं की, जिसमें प्रांजल को 85 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे। इसके बाद उन्होंने मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से बीए की पढ़ाई की। ग्रैजुएशन के दौरान प्रांजल और उनके एक दोस्त ने प्रथम बार यूपीएससी के बारे में एक लेख पढ़ा। प्रांजल ने यूपीएससी की परीक्षा से संबंधित जानकारियाँ जुटानी शुरू कर दीं। इस बात का जिक्र प्रांजल ने किसी से नहीं किया, परंतु मन ही मन उन्होंने आईएएस बनने की ठान ली थी। बीए करने के बाद वह दिल्ली पहुँचीं और जेएनयू से एमए किया। इस दौरान प्रांजल ने आँखों से अक्षम लोगों के लिये बने एक खास सॉफ्टवेयर जॉब एक्सेस विद स्पीच की मदद से 2015 में UPSC की तैयारियाँ शुरू कर दी। उनकी सबसे बड़ी बात ये थी कि UPSC की परीक्षा के लिये उन्होंने किसी कोचिंग की मदद नहीं ली। प्रांजल कहती हैं कि जापान के बौद्ध विचारक डाईसाकू इगेडा के लेखन को पढ़ कर वे अपने दिन की शुरुआत करती हैं। प्रांजल कहती हैं कि “सफलता आपको प्रेरणा नहीं देती है। सफलता के लिये किये गये संघर्ष से ही प्रेरणा मिलती है।”

रेलवे ने नौकरी देने से किया मना तो बनीं कलेक्टर

प्रांजल पाटिल ने 2016 की UPSC परीक्षा में 773वीं रैंक हासिल की थी। खास बात यह थी कि प्रांजल ने यह कामयाबी अपनी पहली ही कोशिश में हासिल कर ली थी। 773वीं रैंक आने के बाद प्रांजल को भारतीय रेलवे लेखा सेवा (IRAS) में नौकरी आवंटित की गई थी, परंतु ट्रेनिंग के समय रेलवे मंत्रालय ने उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया था, जिसकी वजह रेलवे मंत्रालय ने प्रांजल की 100 फीसदी नेत्रहीनता बताया था। इसके बाद प्रांजल ने 2017 में पुनाः UPSC की परीक्षा दी और 124वीं रैंक हासिल की। ट्रेनिंग के बाद प्रांजल ने 2017 में केरल की एरनाकुलम् की उप कलेक्‍टर के रूप में अपने प्रशासनिक करियर की शुरुआत की। प्रांजल अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने पति एलबी पाटिल को देती हैं, क्योंकि विवाह के दौरान प्रांजल के पति ने एक शर्त रखी थी कि वे अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी, जो उनके लिये सबसे बड़ा सहयोग बना। प्रांजल ने बताया कि उप कलेक्‍टर बनने के बाद अब उनका लक्ष्‍य है मलयालम भाषा सीखना। सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवक-युवतियों के लिये उन्होंने कहा कि सभी को स्वयं पर विश्वास रखना चाहिए। चुनौती का सामना करने के बाद ही अच्‍छे परिणाम मिलते हैं। इसलिये किसी भी तरह की चुनौती से ना घबराएँ। प्रांजल का कहना है कि सफलता मिलने में समय अवश्य लग सकता है, परंतु हमें हार नहीं माननी चाहिए। उनका मानना है कि धैर्य रखना ही सबसे बड़ी प‍रीक्षा है।

ट्रांसप्लांट के जरिए भी ठीक नहीं हो सकती आँखें

प्रांजल के बारे में एक स्थानीय समाचार पत्र में पढ़ने के बाद समर कुमार दत्ता नाम के एक व्यक्ति ने उन्हें अपनी एक आँख देने की पेशकश भी की है, परंतु प्रांजल की आँखों की हालत ऐसी नहीं है कि ट्रांसप्लांट के जरिए भी उनकी आँख ठीक हो सके और वे पुनः देख पाएँ। हालाँकि उनके दृढ़ संकल्प की शक्ति अब दुनिया देख रही है।

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