प्लास्टिक : जो प्रयोग से लेकर बना परेशानी का सबब, अब बनेगा पेट्रोल

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 11 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। प्लास्टिक एक ऐसी क्रांति का नाम है जिसने पहले प्रयोग से ही ऐसी क्रांति की कि आज वह हर घर और हर व्यक्ति की अहम जरूरत बन गया। फिर यही प्लास्टिक उसी इंसान के लिये परेशानी का सबब भी बना और पर्यावरण के लिये भी चुनौती बन गया। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार ने इस चुनौती से निपटने का बीड़ा उठाया और 2022 तक देश को प्लास्टिक से मुक्त करने का अभियान शुरू किया है। जबसे दुनिया को प्लास्टिक के नुकसानों का अहसास हुआ है तभी से प्लास्टिक के कचरे के निराकरण के उपाय सोचे जाने लगे। परिणामतः प्लास्टिक से छुटकारा पाने के लिये अलग-अलग क्षेत्र के लोगों ने अपने-अपने स्तर पर प्रयोग शुरू किये हैं। यह जानने के बाद कि प्लास्टिक का कचरा सदियों तक ज़मीन में गढ़े रहने के बावजूद गलता नहीं है, उसे अन्य वस्तुओं में तब्दील करने की मुहिम शुरू हो गई। प्लास्टिक को रोड बनाने में उपयोग किया जाने लगा। अन्य कई क्षेत्रों में भी प्लास्टिक का उपयोग करके उसके कचरे का निपटारा किया जाने लगा। अब उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक युवा वैज्ञानिक ने प्लास्टिक से पेट्रोल बनाने का नवीनतम आविष्कार किया है और उसने अपनी इस खोज का पेटेंट भी करवा लिया है। अब वह प्लास्टिक से पेट्रोल बनाने का संयंत्र (फैक्टरी) लगाने जा रहा है, जिसके लिये उसे स्थानीय नगर निगम ने जमीन और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने लोन देकर मदद देने की पहल भी की है। इतना ही नहीं, इंदौर की एक कंपनी ने उससे सस्ता पेट्रोल खरीदने की तैयारी जता कर भी इस युवा वैज्ञानिक का उत्साह बढ़ाया है।

कब और कैसे हुआ प्लास्टिक का सर्जन ?

प्लास्टिक की पहली खोज 1856 में ब्रिटिश रसायन वैज्ञानिक अलेक्जेंडर पाक्स ने की थी। उन्होंने पेर्सेनस को जैविक ईंधन से प्राप्त कार्बनिक पदार्थ नाइट्रो सेल्युलॉज के साथ उपयोग करके प्लास्टिक बनाया था। अलेक्जेंडर पाक्स ने 1862 में लंदन में आयोजित एक प्रदर्शनी में पहली बार अपनी इस खोज का प्रदर्शन किया था। उस समय इसे ‘पार्कसिने’ नाम दिया गया था। पेर्सेनस और सेल्युलॉज के द्रव्य को गरम करके ठंडा होने दिया जाता था, जिससे वह एक ठोस आकार में तब्दील हो जाता था। इस ठोस पदार्थ से मनचाहे आकार की वस्तुएँ बनाई जा सकती थी। हालाँकि जिस कंपनी ने इसे बनाने का जिम्मा उठाया, वह दिवालिया हो गई, जिसके बाद इसे बनाने का काम छोड़ दिया गया था। इसके बाद आधुनिक ‘प्लास्टिक’ की खोज 1907 में हुई। इसे लियो बेकलैंड ने बनाया और प्लास्टिक नाम दिया। यह प्लास्टिक पॉलीमर प्लास्टिक है। यह प्लास्टिक एक ऐसी सामग्री है जो सिंथेटिक या अर्ध-सिंथेटिक कार्बनिक यौगिकों की एक विस्तृत श्रृंखला है। सामान्य शब्दों में कहें तो एक ऐसा लचीला पदार्थ है, जिसे ठोस वस्तुओं में ढाला जा सकता है। सिंथेटिक आम तौर पर पेट्रोकेमिकल से प्राप्त होते हैं। यह पहला ऐसा प्लास्टिक था जो कम पैसों में सस्ती तकनीक से बनता था। इसलिये यह लोकप्रिय हो गया और धीरे-धीरे इसने ऐसी क्रांति की कि प्लास्टिक से हर उपयोग और जरूरत की चीज का निर्माण किया जाने लगा। सस्ती होने के कारण लोग इसे उपयोग में लाने लगे और धीरे-धीरे इसने सभी घरों तक अपनी पहुँच बना ली और हर व्यक्ति की जरूरत बन गया। यह सस्ता होने के साथ-साथ पारदर्शी भी था और वजन में हलका था। इसलिये सोडे की बोतलों के रूप में यह प्रचलित हुआ। इसके बाद 1929 में पॉलिस्टीरिन, 1930 में पॉलिएस्टर और पॉलीविनैक्लोराइड (पीवीसी), 1933 में पॉलीथिन, 1935 में नायलॉन और 1941 में पॉलिथिलीन टेरेफाथलेट (पीईटी) का आविष्कार हुआ। शुरुआत में तो इसे फायदाकारक माना गया। क्योंकि अभी जो प्लास्टिक की वस्तुएँ इस्तेमाल होती हैं, उनके लिये पहले लकड़ी और लोहे जैसी विभिन्न धातुओं का प्रयोग होता था, जो वजन में भी भारी होती थी और महँगी भी होती थी। जब पूरी दुनिया पर प्लास्टिक का साम्राज्य स्थापित हो गया तो वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक की कमियों और उसके नुकसानों के बारे में खोजबीन शुरू की, तब पता चला कि जिसे फायदे का सौदा माना जा रहा था, वह प्लास्टिक तो परेशानी का कारण है।

लकड़ी और लोहे सहित विभिन्न धातुएँ तो ज़मीन में दबे रहने पर कुछ समय में गल कर नष्ट हो जाती हैं, परंतु प्लास्टिक का कचरा दुनिया में इकट्ठा हो रहा है और यह गलता भी नहीं है। इसे जलाने से वातावरण को नुकसान होता है। तब इसके निराकरण के लिये नये-नये तरीके खोजे जाने लगे और इस कचरे को पिघला कर रोड बनाने में प्रयोग किया जाने लगा। प्लास्टिक के कचरे को रिसाइकल करके विभिन्न वस्तुएँ बनाई जाने लगी, परंतु खोज में सामने आया कि सिंगल यूज प्लास्टिक से बार-बार रिसाइकल करके बनाई जाने वाली प्लास्टिक की वस्तुएँ अधिक हानिकारक होती है तो ऐसी वस्तुओं के निर्माण और उपयोग पर पाबंदियाँ लगाने की मुहिम शुरू की गई।

2022 तक भारत को प्लास्टिक मुक्त करने की मुहिम

मोदी सरकार ने प्लास्टिक से मानव जीवन और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाने के लिये 2022 तक देश को प्लास्टिक मुक्त करने का अभियान शुरू किया है। यूरोपियन यूनियन ने भी वर्ष 2021 तक सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग भी पूरी तरह से बंद करने का लक्ष्य सुनिश्चित किया है, जबकि पड़ोसी देश चीन के कॉमर्शियल हब शंघाई ने भी 2025 तक सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्णतः पाबंदी लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

प्लास्टिक बना आतंकवाद, कचरे की स्थिति चिंताजनक

भारत में प्लास्टिक कचरे की स्थिति चिंताजनक है और इसके निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है। देश में प्रति दिन लगभग 9,205 टन प्लास्टिक कचरा जमा होता है और इसे रिसाइकल किया जाता है। इसके बावजूद 6,137 टन प्लास्टिक कचरा भारतीय ज़मीन पर, नदी-नालों और पर्वतों पर ही पड़ा रहता है। पूरा देश प्रति वर्ष 56 लाख टन प्लास्टिक का कचरा पैदा करता है, जो शर्मनाक है। इसमें से आधा कचरा ठीक से उठाया नहीं जाता है जो उड़ते हुए या बह कर नदियों में पहुँचकर नुकसान पहुँचाता है। पूरी दुनिया की बात की जाए तो संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार संपूर्ण विश्व प्रति वर्ष दस खरब प्लास्टिक बैग उपयोग करके फेंक देता है। यानी कि हर मिनट में दस लाख प्लास्टिक बैग उपयोग करके कचरे में फेंक दिये जाते हैं। ये कचरा रिसाइकल भी नहीं होता है और न ही अन्य किसी प्रकार से इकट्ठा करके प्रयोग किया जाता है। यह जमीन में दब कर जमीन को और उसमें उगने वाली वनस्पति को नुकसान पहुँचाता। समुद्र और नदी नालों में जाकर पानी को विषैला बनाता है और मानव जीवन तथा जलचर प्राणियों को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक कचरा जलाया जाता है तो उसका धुँआ न सिर्फ वायु को प्रदूषित करता है बल्कि पर्यावरण में मिल कर कई प्रकार के रोगों को भी जन्म देता है। संक्षेप में कहा जाए तो प्लास्टिक एक आतंकवाद का स्वरूप ले चुका है, जिससे निपटने की चुनौती केवल भारत के समक्ष ही नहीं, पूरी दुनिया के समक्ष है।

प्लास्टिक से बनेगा पेट्रोल !

गोरखपुर शहर के राप्तीनगर में रहने वाले युवा वैज्ञानिक शिवम पांडेय ने पर्यावरण के लिये परेशानी का सबब बन चुके प्लास्टिक के निराकरण का एक नायाब तरीका खोज निकाला है। शिवम ने प्लास्टिक के कचरे से कच्चा तेल यानी पेट्रोलियम पदार्थ बनाने की खोज की है। इससे न केवल प्लास्टिक के कचरे का निराकरण होगा, बल्कि सस्ता पेट्रोल भी मिलेगा। शिवम ने अपने फॉर्मूले को पेटेंट करवा लिया है। अब शिवम एक फैक्टरी लगाने जा रहे हैं। उनके 56 लाख के प्रोजेक्ट को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने लोन देने की मंजूरी दी है। जबकि गोरखपुर नगर निगम ने उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिये धोबी घाट के पास 12 डिस्मिल जमीन भी उपलब्ध कराने की अनुमति दी है। शिवम के अनुसार उसकी फैक्टरी से प्रति दिन लगभग 3,300 लीटर कच्चा तेल तैयार होगा। इस फैक्टरी में मात्र 20 रुपये में एक लीटर कच्चा तेल तैयार किया जाएगा, जबकि बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 45 से 50 रुपये प्रति लीटर है। शिवम के मुताबिक इंदौर की एक कंपनी हीरा एनर्जी सिस्टम से उसकी बात हुई है, जो उसके कच्चे तेल को खरीदने के लिये तैयार है। यह कंपनी शिवम को कच्चे तेल की कीमत प्रति लीटर 37 रुपये तक देने को तैयार है। शिवम के पिता गिरिजेश पांडेय कृषि विभाग के कर्मचारी हैं। शिवम के अनुसार वह चार साल पहले 10वीं कक्षा में मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) से जुड़ा था और रिसर्च शुरू की थी। जब उसने जलते हुए प्लास्टिक से तेल जैसा द्रव्य गिरते हुए देखा तो उसे विचार आया कि हाइड्रो कार्बन को भी तोड़ा जा सकता है।

इसके बाद शिवम ने प्लास्टिक और पॉलीथिन को डीकंपोज करने का घर पर ही प्रयोग किया, जिसमें सफलता मिलने पर एमएमएमयूटी का संपर्क किया। अभी शिवम हिमाचल यूनिवर्सिटी से बीएससी कर रहा है। शिवम के अनुसार प्लास्टिक को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट कर केमिकल ज़ेड एसएम-5, चीनी मिट्टी, पॉली अमोनियम सिलिकेट एल्युमिना को एक निश्चित मात्रा में मिलाया जाता है। वैक्यूम प्रेशर से उनकी ऑक्सीजन को निकाल दिया जाता है। ऑक्सीजन के बिना उसे 450 से 500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है। एक निश्चित तापमान और दबाव पर इसे दोबारा गर्म किया जाता है, इससे जो गैस निकलेगी, उसे ठंडा करने पर कच्चे तेल के रूप में द्रव्य मिलता है। इसी बीच ईंधन के योग्य गैस भी निकलेगी, जिसे शिवम प्लांट को गर्म करने के लिये उपयोग करेगा। इस तरह से शिवम ने प्लास्टिक के कचरे के योग्य निराकरण का नया तरीका लोगों को सुझाया है। अन्य युवा भी ऐसा करके अपने संयंत्र लगा सकते हैं और जगह-जगह ऐसे संयंत्र लग जाने से देश में प्लास्टिक के कचरे के योग्य निराकरण की एक व्यवस्था बन जाएगी और साथ ही सस्ते पेट्रोल के साथ युवाओं को रोजगार का नया विकल्प भी मिलेगा।

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