कलियुग की इस ‘संजीवनी’ को आख़िर किसकी लग गई नज़र ?

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 22 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस यानी संजीवनी एक लिथोफाइटिक पौधा है, जो भारत में पाया जाता है। यह एक भारतीय औषधि है, जिसे संजीवनी या संजीवनी बूटी कहा जाता है। संजीवनी का अर्थ है “जो मृतक को सजीव कर सकता है”। संजीवनी का उल्लेख रामायण में भी मिलता है। रामायण में युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण और रावण पुत्र मेघनाद के मध्य भयंकर युद्ध शुरू होता है, तब मेघनाद लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है और लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। लक्ष्मण को जीवित करने के लिए हुनुमान अरावली पर्वत पर स्थिति संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाते हैं। ठीक इसी तरह आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक (Antibiotic) को संजीवनी माना जाता है, जो जीवाणु को मार कर उसके विकास को रोकता है। प्रतिजैविक रोगाणुरोधी यौगिकों का एक व्यापक समूह है, जिसका उपयोग कवक और प्रोटोज़ोआ सहित सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखे जाने वाले जीवाणुओं के कारण हुए संक्रमण के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। उत्पत्ति पर आधारित ‘एंटीबायोटिक’ को प्राकृतिक, सेमीसिंथेटिक और सिंथेटिक के अतिरिक्त सूक्ष्मजीवों पर उनके प्रभाव के अनुसार दो समूहों में विभाजित किया गया है एक जीवाणुओं को मारने वाले और दूसरा जीवाणुनाशक एजेंट यानी जो बैक्टीरिया के विकास को दुर्बल करते हैं।

क्या है प्रतिजैविक का इतिहास ?

Alexander Fleming

20वीं सदी की शुरुआत से पहले ही कई संक्रामक रोगों के उपचार औषधियों पर ही आधारित थे। प्राचीन चीनी चिकित्सा में संक्रमण के उपचार के लिए पौधों से प्राप्त प्रतिजैविक तत्वों का उपयोग 2,500 वर्ष पहले शुरू हो चुका था। प्राचीन मिस्र, प्राचीन यूनानी और मध्य युगीन अरब जैसी कई प्राचीन सभ्यताओं में संक्रमण के इलाज के लिए फफूंद और पौधों का इस्तेमाल होता था। 17वीं सदी में कुनैन की छाल का उपयोग मलेरिया के उपचार के लिए व्यापक रूप से होता था, जो रोगजीनस प्लासमोडियम के प्रोटोजोन परजीवी के कारण होता है। बीमारियाँ क्यों होती हैं, यह जानने-समझने के वैज्ञानिक प्रयासों, सिंथेटिक प्रतिजैविक कीमोथेरेपी के विकास और प्राकृतिक प्रतिजैविक दवाओं का पृथक्करण प्रतिजैविक के विकास में मील के पत्थर साबित हुए थे। प्रथम प्राकृतिक प्रतिजैविक पेनिसिलिन की खोज 1928 में अलेक्ज़ैंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) ने की थी। मूलतः एंटीबायोसिस या प्रतिजैविक दवाइयाँ बैक्टीरिया के विरुद्ध काम करती हैं। फ्रांस के जीवाणु वैज्ञानी विलेमिन ने इन दवाओं के असर का वर्णन करने के लिए एंटीबायोसिस का पहली बार वर्णन 1877 में बैक्टीरिया नाम से किया था। सूक्ष्मजैविकी के क्षेत्र में युगपुरूष माने जाने वाले लुईस पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने भी माना कि हवा से पैदा हुए एक बैसिलस द्वारा बैसीलस एंथ्रासिस के विकास को इस दवा से रोका जा सकता है। इन दवाओं को 1942 में अमेरिकी सूक्ष्मजीव वैज्ञानी सेलमैन अब्राह्म वाक्समैन (Selman Abraham Waksman) ने प्रतिजैविक नाम दिया। 1880 में जर्मनी चिकित्सा वैज्ञानी पॉल एर्लीच ने प्रतिजैविक सालवर्सन नामक दवा की खोज की, हालाँकि, पार्श्व कुप्रभाव (साइड इफेक्ट) और बाद में प्रतिजैविक पेनिसिलिन की खोज के बाद सालवर्सन का प्रतिजैविक के रूप में इस्तेमाल खत्म हो गया। 1932 में डोमेक ने प्रोन्टोसिल की खोज की। पहले व्यावसायिक रूप से उपलब्ध जीवाणुरोधी प्रतिजैविक प्रोंटोसिल का विकास गेरहर्ड डोमेक, जिन्हें उनके प्रयासों के लिए 1939 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार भी मिला था, की अगुवाई वाली एक टीम ने जर्मनी के IG फारबेन कांग्लोमरेट केबेयर प्रयोगशालाओं में किया। प्रोन्टोसिल का ग्रैम पोजिटिव कोकी पर अपेक्षाकृत व्यापक प्रभाव दिखा और यह इंट्रोबैक्टीरिया के खिलाफ भी नहीं था। इस पहली सल्फोनामाइड दवा के विकास से प्रतिजैविक दवाओं के युग की शुरुआत हुई।

प्रतिजैविक दवाओं का उत्पादन

1939 में पहली बार फ्लोरे और चैन के अहम प्रयासों के बाद से चिकित्सा में प्रतिजैविक दवाओं के महत्व के कारण इनकी खोज और उत्पादन के लिए शोध की प्रेरणा मिली है। उत्पादन की प्रक्रिया में सामान्यतः सूक्ष्मजीवों की व्यापक श्रेणियों का निरीक्षण और उनका परीक्षण तथा संशोधन शामिल होता है। उत्पादन किण्वन (फर्मेंटेशन) के जरिये, आमतौर पर मजबूत एरोबिक तरीके से किया जाता है। मौखिक प्रतिजैविक को निगलकर लिया जाता है, जबकि नसों के जरिये दिये जाने वाले प्रतिजैविक और ज्यादा गंभीर मामलों, जैसे गहराई तक फैले प्रणालीगत संक्रमणों में इस्तेमाल किये जाते हैं। प्रतिजैविक का प्रयोग कभी-कभी बाहर से भी किया जाता है, जैसे आंख में डाली जाने वाली दवाएं या मरहम.

प्रतिजैविक का दुरुपयोग से कम हो रहा असर

यू्एस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अपने एक पोस्टर ‘गेट स्मार्ट’ अभियान में चेतावनी दी गई है कि प्रतिजैविक दवाएँ वायरल रोगों जैसे आम सर्दी में काम नहीं करते हैं और अनुपयुक्त प्रतिजैविक उपचार और प्रतिजैविक का अति प्रयोग प्रतिरोधी जीवाणुओं के उभरने का एक मुख्य कारक हैं। समस्या तब और जटिल हो जाती है, जब एक मरीज़ योग्य चिकित्सक के निर्देशों के बिना स्वयं प्रतिजैविक लेना शुरू करता है और कृषि में विकास प्रमोटरों के रूप में प्रतिजैविक का गैर-चिकित्सकीय उपयोग होता है। प्रतिजैविक दवाओं में बार-बार ये संकेत दिये जाते हैं कि कहाँ इनकी जरूरत नहीं हैं, या उपयोग गलत है या दिया गया प्रतिजैविक मामूली असर वाला है। यह कुछ वैसे मामलों में भी होता है, जहाँ संक्रमण बिना इलाज के भी ठीक हो सकता है। पेनिसिलिन और इरिथ्रोमाइसिन जैसे प्रतिजैविक, जो एक समय चमत्कारिक इलाज माने जाते थे, के अतिप्रयोग से 1950 के दशक के बाद से इनके प्रतिरोधक तत्व उभरने शुरू हो गये थे। अस्पतालों में प्रतिजैविक दवाओं के चिकित्सीय उपयोग को बहु-प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीवाणुओं की वृद्धि के साथ जोड़ा जाता रहा है। वहीं जनवरी 2016 से अक्टूबर 2017 के बीच एम्स ट्रॉमा सेंटर में लगभग 22 मरीज ऐसे थे जो आखिरी विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने वाली ऐंटीबायॉटिक्स कोलिस्टिन पर भी रेस्पॉन्ड नहीं कर रहे थे। ये सभी मरीज, मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट इन्फेक्शन से पीड़ित थे, जो ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया के निमोनिए की वजह से फैलता है। एम्स, सीएमसी वेल्लोर और अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के वैज्ञानिकों की तरफ से करवाई गई रिसर्च में यह बात सामने आई कि 22 में से 10 मरीज यानी करीब 45 प्रतिशत की तो अस्पताल में ऐडमिट होने के 15 दिन के अंदर ही मौत हो गई थी। बाकी के 12 मरीजों को बचा तो लिया गया लेकिन करीब 23 दिनों तक उन्हें अस्पताल में ही भर्ती रहना पड़ा और उन्हें बेहद पावरफुल दवाइयाँ देनी पड़ीं। एम्स की इस स्टडी में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि सभी 22 मरीज सिर्फ ऐंटीबायॉटिक्स ही नहीं बल्कि कई दूसरी हाई एंड ड्रग्स जैसे- कैरबेपेनम्स, एक्सटेंडेड स्पेक्ट्रम सीफालोस्पोरिन्स और पीनिसिलिन बी लैक्टामेज के प्रति भी रेजिस्टेंट थे। इन्फेक्शन कंट्रोल ऐंड हॉस्पिटल एपिडोमोलॉजी नाम के जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि डॉक्टर्स, माइक्रोबायॉलिजिस्ट और पब्लिक हेल्थ ऑफिशल्स सभी को मिलकर कार्रवाई करने की जरूरत है ताकि इस मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट ऑर्गैनिज्म को फैलने से रोका जा सके।

एंटीबायोटिक के दुष्प्रभाव

हालांकि आमतौर पर प्रतिजैविक दवाओं को सुरक्षित और अच्छी तरह सहन करने योग्य माना जाता है, पर ये व्यापक रूप से प्रतिकूल प्रभाव से भी जुड़ी हुई हैं। दुष्प्रभाव कई तरह के, विविध रूपों वाले और पूरी तरह प्रतिजैविक के उपयोग और लक्ष्यित किये जाने वाले सूक्ष्मजीवों पर निर्भर होते हैं। नई दवाओं से उपचार के सुरक्षा प्रोफाइल कई वर्षों से उपयोग की जा रही दवाओं जितने स्थापित नहीं है। प्रतिकूल प्रभाव बुखार और मिचली से लेकर फोटोडर्माटाइटिस और एनाफिलिक्स जैसे बड़े एलर्जी तक के रूप में दिख सकते हैं। आम रूप से दिखने वाले दुष्प्रभावों में से एकदस्त है, जो कभी-कभी एनेरोबिक बैक्टीरियम क्लोस्ट्रिडियम डिफिसाइल के कारण होते हैं और यह प्रतिजैविक द्वारा आंत के फ्लोरा के सामान्य संतुलन को अस्तव्यस्त करने से होता है। रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया की इस तरह अतिवृद्धि को प्रतिजैविक लेने के दौरान प्रो-बायोटिक की खुराक लेने से खत्म किया जा सकता है। प्रतिजैविक के कारण उन जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ सकती है जो सामान्य रूप से योनि के फ्लोरा के घटक के रूप में उपस्थित होते हैं और इससे वोल्वों-योनि क्षेत्र में जीनस कैंडीडा खमीर की प्रजातियों का जरूरत से ज्यादा विकास हो सकता है।

कई देशों में दुरुपयोग-अतिप्रयोग के विरुद्ध अभियान

अमेरिका के इंटरएजेंसी रोगाणुरोधी प्रतिरोध टास्क फोर्स की स्थापना का मकसद प्रतिजैविक दवाओं के दुरुपयोग और अतिप्रयोग से जुड़े मुद्दों से निपटने का प्रयास करना है, जिसका मकसद रोगाणुरोधी प्रतिरोध की समस्याओं का सक्रियता से अध्ययन करना है। अमेरिकी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, द फूड एंड ड्रग एडमिनिस्‍ट्रेशन (FDA), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) तथा कई अन्य सरकारी एजेंसियां इन मुद्दों पर विचार के लिए आपस में समन्वय रखती हैं। एक गैर सरकारी संगठन अभियान समूह का नाम “कीप एंटीबायोटिक वर्किंग” है। फ्रांस में 2002 से एक सरकारी अभियान “एंटीबायोटिक्स आर नॉट ऑटोमैटिक” शुरू किया गया है, जिससे अनावश्यक प्रतिजैविक नुस्खों, खासकर बच्चों के लिए, में कमी आई है। यूनाइटेड किंगडम में, कई डॉक्टरों के क्लिनिकों में NHS पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें संकेत किया गया है कि ‘दुर्भाग्य से, प्रतिजैविक दवाओं की कितनी भी मात्रा आपको सर्दी से छुटकारा नहीं दिला सकती, क्योंकि कई रोगी अपने डाक्टर से खासकर अनुपयुक्त प्रतिजैविक देने का अनुरोध करते है, इस विश्वास से कि उन्हें वायरल संक्रमण के इलाज में मदद मिलेगी। कृषि में, पशुओं में वृद्धि-प्रायोजकों के रूप में प्रतिजैविक दवाओं के गैर-निदानमूलक उपचार के साथ संबद्ध प्रतिजैविक प्रतिरोध 1970 में ब्रिटेन में (Swann 1969 की रिपोर्ट) के बाद प्रतिबंधित रूप में शुरू हुआ। वर्तमान में पूरे यूरोपीय संघ (EU) में विकास प्रायोजकों के रूप में प्रतिजैविक दवाओं के गैर-निदानमूलक उपयोग पर पाबंदी लगी है। यूरोपीय संघ ने 2003 के बाद से विकास संवर्द्धक एजेंट के रूप में प्रतिजैविक दवाओं के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने दी चेतावनी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए, सभी देशों को एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक उपयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए उपकरण अपनाने चाहिए। WHO ने AWARe नामक अपने स्वयं के उपकरण को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जो WHO आवश्यक दवाओं की सूची का हिस्सा है। AWaRe को 2017 में लॉन्च किया गया था, और यह एंटीबायोटिक दवाओं को तीन श्रेणियों (एक्सेस, वॉच और रिजर्व) में विभाजित करता है। यह सामान्य संक्रमणों के इलाज के लिए प्रथम-पंक्ति एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए, दूसरी और तीसरी-पंक्ति एंटीबायोटिक दवाओं और “अंतिम उपाय” एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक विवेकपूर्ण को प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। AWARe टूल 37 एंटीबायोटिक दवाओं को वर्गीकृत करता है, जिनमें से 19 एक्सेस श्रेणी में हैं जैसे कि एमोक्सिसिलिन। डब्‍ल्‍यूएचओ ने कहा कि वॉच श्रेणी में शेष एंटीबायोटिक दवाओं (जैसे सीफ्रीट्रैक्सोन) और रिजर्व श्रेणी (जैसे कोलीस्टिन) के अनावश्यक उपयोग को कम करना लक्ष्य होगा। डब्ल्यूएचओ के अधिकारियों ने कहा कि इस पहल का लक्ष्य एक्सेस ग्रुप में एंटीबायोटिक्स की वैश्विक खपत को 2030 तक कम से कम 60% तक बढ़ाना है और वॉच और रिजर्व समूहों के प्रतिरोध के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग को कम करना है। डब्ल्यूएचओ 19 जून को नोर्डविज्क, द नीदरलैंड में रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर एक सम्मेलन में कहा कि वह “एडॉप्ट एडब्ल्यूआरआरई : हैंडल एंटीबायोटिक्स विद केयर” नामक एक वैश्विक अभियान शुरू करने के लिए तैयार है। WHO ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अगर हर तरह के ऐंटीबायॉटिक्स के यूज को कंट्रोल नहीं किया गया तो इंसानी सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी और एक बार फिर उस सिचुएशन में पहुंच जाएगी जहां निमोनिया, टीबी और गोनिरिया जैसे इन्फेक्शन का इलाज भी नहीं हो पाएगा।

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