ऐसा गांव जिसने दी 55 National women hockey players

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Hockey Players

Indians में Cricket को लेकर क्या क्रेज है यह सभी को मालूम है। वही National Sports, Hockey की दुर्दशा भी किसी से छिपी नहीं है। Cricketers की चकाचौंध वाली दुनिया हम सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन Hockey Players की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। ऐसे में www.yuvapress.com आपको एक ऐसे गांव की कहानी बताने जा रहा है जिसने अब तक 55 नेशनल लेवल Women hockey players देश के दिए हैं।

झारखंड की राजधानी रांची(Ranchi) से करीब 50 किलोमीटर दूर हेसल (Hesal) एक आदिवासी बाहुल्य गांव है जिसमें 60 परिवार रहते हैं। इस गांव को अगर Women’s hockey in India की नर्सरी कहे तो गलत नहीं होगा। संसाधनों की कमी के बावजूद इस गांव ने 55 नेशनल लेवल Women hockey players को तैयार किया है। गांव की लड़कियां दिन भर खेतों में काम करती हैं लेकिन सपने ओलंपिक (Olympic) में भारतीय टीम को प्रतिनिधित्व करने का देखती हैं।

 

 

आजादी के 7 दशक गुजर जाने के बावजूद झारखंड विकास से काफी दूर है। खासकर आदिवासी बाहुल्य इलाकों में संसाधनों का बहुत अभाव है। इन इलाकों में आज भी बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है। गांव के लोगों का मानना है कि अगर विकास की मुख्यधारा से खुद को जोड़ना है और गरीबी मिटानी है तो Sports एकमात्र तरीका है। Sports में नाम कमाकर सरकारी नौकरी आसानी से मिल जाती है जिससे जिंदगी बदल सकती है। इसी वजह से 1990 के दशक से ही गांव के लोगों में Sports के प्रति रुझान बढ़ा।

हेसल (Hesal) गांव की निक्की प्रधान (Nikki Pradhan) ने पहली बार Rio Olympics में देश का प्रतिनिधित्व किया था। निक्की प्रधान (Nikki Pradhan) 2017 में हुए एशिया कप (Asia Cup) में भी भारतीय टीम का हिस्सा थीं। उस टूर्नामेंट में भारतीय महिला हॉकी टीम ने चीन को पटखनी दी थी। अब तक इस गांव ने 5 International level hockey players को जन्म दिया है। देश का इतना मान बढ़ाने के बावजूद आज भी गांव की बेटियों को संसाधनों की कमी से जूझना पड़ रहा है। खेल मंत्रालय के लिए शर्म की बात है कि देश के लिए इतना कुछ करने के  बावजूद भविष्य की खिलाड़ियों को टूटे hockey kits और खुले पैर Hockey खेलना पड़ता है।

 

यहां की खिलाड़ी को पेटभर खाना नसीब से मिलता है। आज भी इनकी जिंदगी सरकारी सब्सिडी पर मिलने वाले राशन के सहारे गुजरती है। दो वक्त के खाने के लिए इन्हें दिन भर मजदूरी करनी पड़ती है फिर इन्हें खाना नसीब होता है। मुश्किल हालात के बावजूद लड़कियां काम के साथ-साथ अपने खेल और पढ़ाई पर ध्यान देती हैं। कक्षा 7 तक के बच्चों को मिड-डे मील का खाना मिल जाता है लेकिन 8वीं क्लास में जो छात्राएं पढ़ती हैं उन्हें भूखे पेट प्रैक्टिस करना पड़ता है।

गांव की बेटियों में Hockey के प्रति इतना Craze, Inspiration, Coaching और Support कहां से मिलता है यह एक दिलचस्प कहानी है। 1989 में दशरथ महतो (Dasrath Mahto) ने गांव की कुछ लड़कियों को Hockey की ट्रेनिंग देना शुरू किया था। शुरुआत अच्छी हुई तो गांववालों की दिलचस्पी बढ़ी और लोगों ने अपनी बेटियों को उनके इंस्टीट्यूट में भेजना शुरू किया। इस दौरान कुछ खिलाड़ियों का सलेक्शन National level पर हो गया जिससे लोगों और छात्रों का विश्वास बढ़ने लगा और लड़कियों का Hockey खेलना गांव की परंपरा बन गई। पिछले 27 सालों में दशरथ महतो (Dasrath Mahto) ने करीब 72 National and International Woman hockey players को ट्रेनिंग दी है।

 

संसाधनों की कमी इनके हौंसलों की उड़ान को कभी डिगा नहीं पाई। ये लड़कियां खुले पैर हॉकी खेलती हैं, जख्मी होती हैं, हर जख्म के बाद इनका हौंसला और ज्यादा बुलंद होता है और अगली बार ये लड़कियां और तेजी से अपने सपनों का पीछा करती हैं।

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Sports · Sports & Health

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