भारत की इस ‘आम्रपाली’ के पीछे पड़ गई दुनिया ! जानिए क्यों ?

Written by

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 17 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। आम्रपाली। इस शब्द से भारत का कदाचित ही कोई व्यक्ति अनभिज्ञ होगा। सुंदर और सुशील नामक दो गुणों से परिपूर्ण आम्रपाली शब्द पर आधुनिक भारत में बॉलीवुड की एक फिल्म भी बन चुकी है, तो प्राचीन भारत में भगवान विष्णु के 23वें अवतार बुद्ध के कालखंड में एक गणिका का नाम आम्रपाली था, जो नगरवधु के नाम से प्रसिद्ध थी, परंतु भगवान बुद्ध का सान्निध्य प्राप्त करने के बाद वह आम्रपाली गणिका से मोक्ष दशा को प्राप्त करने में सफल हुई थी, परंतु जैसा कि आप जानते हैं कि आम्रपाली शब्द में आम्र समाहित है और आम्र का अर्थ आम होता है। यही कारण है कि हम भारत की जिस आम्रपाली की बात कर रहे हैं, वह कोई सुंदर स्त्री नहीं है।

हम बात कर रहे हैं भारत के राष्ट्रीय फल की और फलों के राजा आम की। वह आम जिसका नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता है, वह आम जिसके बिना गर्मी की सीज़न अधूरी लगती है। वह आम जो अब भारतीय किसानों के लिये कमाई का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है और वह आम जो विदेश जाकर आम से खास बन गया है।

आजकल भारत में ऐसी फसलों पर जोर दिया जा रहा है, जिससे किसान तगड़ी कमाई कर सकें। सरकार भी किसानों की पैदावार को विदेशों में निर्यात करके खूब विदेशी मुद्रा कमा रही है। सरकार की इस नीति के कारण कुछ विपरीत प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं। आजकल विदेशियों को भारतीय आम बहुत पसंद आ रहे हैं। भारतीय आमों के निर्यात से सरकार और किसानों की कमाई भी खूब हो रही है, परंतु अधिकाँश आम विदेश चले जाने से घरेलू बाजार में आम बहुत महँगा हो गया है, जिससे आम आदमी के लिये मीठा आम भी खट्टा हो गया है और उसकी पहुँच से दूर होता जा रहा है।

आम्रपाली आम की विदेशों में बढ़ी माँग

भारतीय आम की यूँ तो लगभग 1000 किस्में हैं। इनमें भी 30 से अधिक किस्में ज्यादा प्रचलित हैं। यह भी विविध राज्यों में पाई जाती हैं। इसी कारण लोगों की पसंद भी अलग-अलग है। जो उत्तर प्रदेश के लोग हैं उन्हें अपने प्रदेश का दशहरी आम ज्यादा पसंद आता है। महाराष्ट्र और गुजरात के लोग हाफुस और केसर आम खाना पसंद करते हैं। दिल्ली के लोग लंगड़ा और चौसा को पसंद करते हैं। वैसे भारतीय लोगों को मीठा आम काफी पसंद आता है। भारतीय आमों में 22 से 24 प्रतिशत शुगर होता है। हालाँकि विदेशी लोग ज्यादा शुगर खाना पसंद नहीं करते हैं और कम मीठे फल खाना पसंद करते हैं। उनकी पसंद को ध्यान में रखकर ही भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) ने आम्रपाली आम की किस्म विकसित की। दूसरी पीढ़ी के लिये पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा पितांबर और पूसा लालिमा विकसित की गई है। इन आमों में शुगर की मात्रा 16 प्रतिशत तक होती है। कम शुगर लेवल की वजह से आम खाने के शौकीन विदेशी इसे खूब पसंद कर रहे हैं। यह कम मीठा होने के कारण डॉक्टर की सलाह पर डायाबिटीज के रोगी भी खा सकते हैं।

पूसा के एक अधिकारी के अनुसार आम्रपाली से पहले आम की संकर किस्म की ‘मल्लिका’ प्रजाति विकसित की गई। यह नीलम आम पर दशहरी आम का क्रॉस था, जिसे भारतीय लोगों में खूब पसंद किया जाता है। विदेशी लोग भी इसे खा तो रहे थे, परंतु ज्यादा मिठास के कारण उन्हें कम पसंद आ रहा था। इसलिये विदेशी ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए पूसा ने अपेक्षाकृत कम मीठे और कुछ खट्टे स्वाद वाली प्रजाति विकसित करने का बीड़ा उठाया। इस प्रकार दशहरी आम पर नीलम आम का क्रॉस कराया गया। इससे आम्रपाली प्रजाति का विकास हुआ। यह अपने लाल सुर्ख रंग और हल्के मीठे स्वाद के कारण विदेशियों की पहली पसंद बन गया है। इस आम की विशेषता यह है कि इसमें विटामिन की मात्रा अन्य आमों की तुलना में दो से ढाई गुना अधिक है। इसलिये जिन लोगों में विटामिन की कमी या रतौंधी जैसा रोग होता है, उनके लिये यह बेहद लाभप्रद है।

किसानों के लिये कमाई का साधन बना आम्रपाली

आम्रपाली आम की खेती किसानों के लिये भी खूब फायदेमंद सिद्ध हो रही है। सामान्य भारतीय आमों के पेड़ों की ऊँचाई 30 से 60 फुट तक और उनके बीच की दूरी कम से कम 10-12 मीटर की होती है। इन पेड़ों में प्रति हेक्टेयर मात्र 6 से 8 टन आमों की पैदावार होती है। जबकि आम्रपाली के पेड़ तीन-साढ़े मीटर ही ऊँचे होते हैं और इनके बीच की दूरी भी तीन मीटर तक ही रखी जा सकती है। इनकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 22-24 टन होती है। अच्छी क्वालिटी के साथ अच्छी क्वांटिटी से बाजार में बेचने पर किसानों को आमों की अच्छी कीमत मिल रही है और सरकार तथा व्यापारी विदेशों में आम्रपाली आम का निर्यात करके अच्छी खासी विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं।

Article Categories:
News · Science · Sports · Sports & Health · Technology

Comments are closed.

Shares