एड्स, कैंसर और डायबिटीज़ का मिल गया तोड़, बस करना होगा इस ‘52 बाहर’ से जोड़ !

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 18 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। प्रकृति के प्रति द्रोह, प्रकृति का दोहन और प्रकृति से विमुख हो रही दुनिया भोगों के पीछे अंधी दौड़ लगा रही है और रोगों को आमंत्रित कर रही है। मानव की इस स्वार्थपरक जीवनशैली ने जहाँ एक ओर जलवायु परिवर्तन (CLIMATE CHANGE-क्लाइमेट चेंज) और वैश्विक गर्मी (GLOBAL WARMING-ग्लोबल वॉर्मिंग) जैसे प्राकृतिक असंतुलन पैदा किया, वहीं मानव को ऐसे-ऐसे संकटों के चक्रव्यूह में फँसा दिया है, जिससे निकलना उसके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। भौतिक सुखों की लालसा में भाग रहे इंसान ने अपनी ओर भोगों की बाढ़ के साथ रोगों की रफ्तार भी तेजी से बढ़ाई है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि मानव जाति को कई ऐसे रोगों ने भी घेर लिया है, जिनका आधुनिक विज्ञान के पास कोई उपचार ही नहीं है।

यद्यपि आधुनिक विज्ञान मानव जाति की दीर्घायु के लिए निरंतर नए-नए पनपते रोगों के उपचार के लिए नई-नई खोज करने में जुटा हुआ है, परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि आधुनिक विज्ञान के पास मानव को मृत्यु से बचाने की कोई युक्ति नहीं है। अरे मृत्यु तो दूर की बात है, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आधुनिक मानव देह में घर कर चुके एड्स, कैंसर और डायबिटीज़ जैसे रोगों का भी अभी तक कोई तोड़ नहीं निकाल पाया है। हजारों प्रकार के रोगों का उपचार करने में सफलता हासिल कर चुका आधुनिक विज्ञान उस व्यक्ति को नया जीवन देने में सक्षम नहीं है, जो एक बार एड्स से संक्रमित हो गया। आधुनिक विज्ञान कैंसर का भी आधा-अधूरा ही इलाज कर पाता है, तो डायबिटीज़ यदि एक बार देह में जम गया, तो उसे जीवन भर ढोना रोगीष्ट की विवशता बन जाता है।

क्या आप जानते हैं कि हमारी भारतीय सनातनी-वैदिक धर्म परम्परा में हर रोग का उपचार संभव है ? हम दुष्प्रभाव का पर्याय बन चुके मॉडर्न मेडकिल साइंस पर भरोसा करते हुए एक रोग का उपचार करवाते हुए साइड इफेक्ट के रूप में दूसरे रोग का भोग बन जाते हैं, परंतु हमारा प्राचीन वैदिक ज्ञान इतना सशक्त है कि वह अनादि काल से चले आ रहे रोगों ही नहीं, अपितु एड्स, कैंसर और डायबिटीज़ जैसे असाध्य रोगों और आगे भविष्य में उत्पन्न होने वाले किसी भी रोग के उपचार में सक्षम है। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में तो एक ऐसी भी युक्ति है, जो बिना किसी दवा (औषधि) के एक साथ हजारों रोगों का उपचार कर सकती है।

क्या है वह ‘52 बाहर’ ?

जी हाँ। यह युक्ति है निराकार ब्रह्म से उठने वाली ध्वनि ॐ। भारतीय सनातन धर्म के अनुसार ॐ ध्वनि ब्रह्म से निकला हुआ एक नाद है और इसी से सारे अक्षर, शब्द, वाक्य और भाषा उत्पन्न हुए। ॐ की विशेषता यह है कि यह 52 अक्षरों से परे है। हिन्दी भाषा में उपयोग किए जाने वाले अक्षरों की संख्या 52 है, परंतु ॐ इन 52 अक्षरों में समाहित नहीं है, अपितु इन सभी अक्षरों का उत्पत्तिकर्ता है। आज हम इस ॐ के चिकित्सकीय महत्व की चर्चा करने जा रहे हैं। इस ‘52 बाहर’ ॐ से योग किया जाए, तो 6 मिनट में 600 क्या, 6000 रोगों को दूर किया जा सकता है। इन रोगों में आधुनिक युग के सबसे भीषण व जानलेवा रोगों एड्स, कैंसर और डायबिटीज़ का भी समावेश हो जाता है। शेष रोगों को तो यह ॐ चुटकी में भगाने में सक्षम है।

क्या कह गए संत तुलसीदास ?

पहले आपको बताते हैं कि 6 मिनट का क्या महत्व है ? इसका महत्व वाल्मीकि लिखित संस्कृत रामायण को जन-जन तक पहुँचाने वाले महान संत तुलसीदास की एक चौपाई से समझा जा सकता है।

एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध ।
तुलसी चरचा राम की, हरै कोटि अपराध ।।

सबसे पहले आपको बताते हैं कि संत तुलसीदास ने जिस राम का उल्लेख किया है, वह केवल त्रेता युग में अवतार लेने वाले प्रभु श्री राम की ही बात नहीं है। तुलसीदास यहाँ पारमार्थिक दृष्टिकोण से यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि राम के रूप में परम-पिता परमेश्वर ने केवल अवतार धारण किया था। वह राम ईश्वर अवश्य थे, परंतु वह राम ही ईश्वर नहीं थे। तुलसीदास जिस राम की बात कर रहे हैं, वह सर्वोच्च सत्ता, निराकार, निरंजन, परम तत्व आत्मा की बात कर रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि मानव एक घड़ी न सही, आधी घड़ी, आधी घड़ी न सही, उसकी भी आधी घड़ी भी उस आत्मा की उपासना करता है, तो हरि उसके कोटि यानी करोड़ों अपराध हर लेता है।

6 मिनट का क्यों है महत्व ?

अब आपको समझाते हैं कि एक घड़ी क्या होती है ? आधुनिक काल में हम जिस घण्टे, मिनट और सेकेण्ड में समय की गणना करते हैं, उसके अनुसार वैदिक काल की घड़ी अर्थात् कितना समय होता है ? तुलसीदास की चौपाई में जिस घड़ी का उल्लेख है, उसकी आधुनिक समयानुसार गणना करें, तो 1 घड़ी अर्थात् 24 मिनट, 1/2 घड़ी अर्थात् 12 मिनट और आधी में पुनि आध यानी 1/4 घड़ी अर्थात् 6 मिनट। इस प्रकार तुलसीदास की चौपाई का संकेत यह है कि यदि 6 मिनट ही उस निराकार ब्रह्म की उपासना की जाए, तो करोड़ों अपराधों का शमन हो सकता है।

एक साधन से करोड़ों साध्य संभव

आते हैं अब शीर्षक यानी मूल विषय पर। तुलसीदास 6 मिनट जिस निराकार ब्रह्म की उपासना की बात कर रहे हैं, उसके माध्यम से मानव स्वयं निराकार ब्रह्म यानी ईश्वर के साथ एकाकार हो सकता है, परंतु हम आधुनिक युग के अत्यंत व्यस्त और स्वयं को देह समझने वाले मानव को निराकार ब्रह्म की उपासना का ज्ञान न देते हुए ईश्वर के उपहार के रूप में मिले शरीर को केवल 6 मिनट की ‘52 बाहर’ ॐ की उपासना से निरोगी रखने की युक्ति बताने जा रहे हैं। आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि क्या ऐसा हो सकता है कि केवल 6 मिनट में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं ? उत्तर है, ‘हाँ हो सकते हैं।’

विज्ञान ने भी माना ॐ का लोहा

निराकार ब्रह्म नाद् अर्थात् ॐ ही वह सटीक माध्यम है, जो 6 मिनट में हर रोग को रफा-दफा कर सकता है। वैज्ञानिक शोध भी यह प्रमाणित कर चुका है केवल 6 मिनट ॐ का उच्चारण करने से सैकडौं रोग ठीक हो जाते हैं, जो दवाइयों से भी इतनी शीघ्रता ठीक नहीं हो पाते।

नीचे दर्शाई गई पद्धति से ॐ की उपासना कीजिए और अनेक असाध्य रोगों से मुक्ति पाइए।

(1) 6 मिनट ॐ का उच्चारण करने से मस्तिष्क में विशेष वाइब्रेशन (कम्पन) होता है और ऑक्सीजन का पर्याप्त संचार होने लगता है। इससे मस्तिष्क से जुड़े तनाव (STRESS) और चिंता (TENSION) जैसे कई रोग देह से दफा होने लगते हैं और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

(2) प्रात:काल और संध्याकाल 6 मिनट ॐ के तीन माह तक उच्चारण से रक्त संचार (BLOOD CIRCULATION) संतुलित होता है और रक्त में ऑक्सीजन का स्तर बढता है। रक्त चाप (BP), हृदय रोग, कोलेस्ट्रॉल जैसे रोग ठीक हो जाते हैं। विशेष ऊर्जा का संचार होता है।

(3) मात्र 2 सप्ताह दोनों प्रहर (प्रात:काल व संध्याकाल) ॐ के उच्चारण से घबराहट, बेचैनी, भय, एंग्ज़ाइटी (ANXIETY) जैसे रोग दूर होते हैं। कंठ में विशेष कंपन होता है और मांस-पेशियों को शक्ति मिलती है। थाइरॉइड, गले की सूजन दूर होती है और स्वर दोष दूर होने लगते हैं। पेट में भी विशेष वाइब्रेशन और दबाव उत्पन्न होता है।

(4) एक माह तक दिन में तीन बार 6 मिनट तक ॐ के उच्चारण से पाचन तंत्र, यकृत (LEVER), आँतों को शक्ति प्राप्त होती है और चयापचय (DIGESTION) सही हो जाता है। साथ ही सैकडौं उदर (पेट) रोग दूर होते हैं।

(5) उच्च स्तर का प्राणायाम होता है और फेफड़ों में विशेष कंपन होता है। फेफड़े मजबूत होते हैं। स्वशन तंत्र की शक्ति बढती है। 6 माह में अस्थमा (दमा), राजयक्ष्मा (T.B.) जैसे रोगों में लाभ होता है। आयु बढती है।

नोट : यह सभी रिसर्च (शोध) और उनके निष्कर्षों व परिणामों को विश्व स्तर के वैज्ञानिक स्वीकार कर चुके हैं। आवश्यकता है प्रतिदिन 6 मिनट ॐ की उपासना करने की। ॐ का उच्चारण लम्बे स्वर में करें। नि:संदेह आप सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे।

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