मेडिकल फील्ड में सुधार का वक्त आ गया है !

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हाल ही में दो ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां बनी, जिन्हें पढ़कर काफी दुख हुआ। दरअसल ये घटनाएं हमारे देश की चिकित्सा व्यवस्था (Medical System)की पोल खोलने के लिए काफी हैं। पहली घटना में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में एक जिंदा बच्चे को मृत बताकर उसके घरवालों को सौंप दिया गया। लेकिन जब घरवालों ने बच्चे की सांसे चलती देखी तो बच्चे को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया। दुख की बात है कि घटना के एक-दो दिन बाद बच्चे ने दम तोड़ दिया। यहां ये सवाल उठता है कि यदि पहले ही अस्पताल ने लापरवाही ना बरती होती तो शायद उस नन्हीं-सी जान को बचाया जा सकता था ?

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दूसरी घटना गुरुग्राम के एक प्रतिष्ठित अस्पताल की है, जहां एक 7 साल की बच्ची को डेंगू होने पर भर्ती कराया गया था। लेकिन अस्पताल ने बच्ची को सही इलाज देने के बजाए बिल बनाने में खासी दिलचस्पी दिखाई। जिसका नतीजा ये हुआ कि बच्ची की जान नहीं बचायी जा सकी। बावजूद इसके अस्पताल प्रशासन ने बच्ची के माता-पिता से 16 लाख रुपए का बिल वसूल लिया। हैरानी की बात है कि ये दोनों ही घटनाएं देश के आधुनिक और विश्वस्तरीय माने जाने वाले अस्पतालों की हैं। हालांकि अच्छी बात है कि इन घटनाओं से सरकारों की नींद टूटी है और दोनों ही अस्पतालों के खिलाफ कड़ी कारवाई होने की बात की जा रही है।

गौर करने वाली बात ये है कि ऐसी घटनाएं हमारे देश में शायद हर रोज घटती हैं, चूंकि ये मामले देश की राजधानी और कथित कॉरपोरेट अस्पतालों के हैं, इसलिए ये मीडिया की निगाह में आएं। हालात देखकर लगता है कि अब देश की चिकित्सा व्यवस्था में बड़े सुधारों की जरुरत है। यूं तो हमारी चिकित्सा व्यवस्था में कई खामियां हैं, लेकिन हम यहां कुछ खामियों की ओर आपका ध्यान दिला रहे हैं।

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डॉक्टरों, दवा कंपनियों का गठजोड़ खतरनाक

 

भारत में डॉक्टरों और दवा कंपनियों का गठजोड़ आम जनता की जेब पर काफी भारी पड़ रहा है। बता दें कि दवा कंपनियां डॉक्टरों के साथ मिलकर अपनी महंगी दवाईयों को बाजार में खपाती हैं। माना जाता है कि इसके बदले डॉक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है। लेकिन इसका असर ये होता है कि डॉक्टर अपने मरीजों को महंगी दवाईयां लिखते हैं, जबकि उसी से मिलती जुलती कई दवाईयां सस्ते दामों पर बाजार में पहले से मौजूद हैं।

 

कॉरपोरेट कल्चर के नुकसान

 

आज देश में कई विश्वस्तरीय अस्पताल मौजूद हैं। जिनमें कॉरपोरेट कल्चर के तहत बेहतरीन सुविधाएं दी जाती हैं। लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं कि कुछ भी फ्री नहीं मिलता, इसलिए इन अस्पतालों में भी सुविधाओं के बदले मोटी रकम वसूली जाती है। ये रकम डॉक्टरों की महंगी फीस, महंगी दवाईयां, डायगनोस्टिक सुविधाओं के तौर पर ली जाती है। लेकिन इस पूरे सिस्टम में आम आदमी का शोषण किया जा रहा है। मतलब यदि एक मरीज वायरल होने पर अस्पताल पहुंचता है तो ये कथित कॉरपोरेट अस्पताल आराम से 5-6 हजार का बिल थमा देते हैं ! गुरुग्राम के अस्पताल का मामला भी कुछ ऐसा ही दिखाई पड़ता है।

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डॉक्टरों की कमी

 

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 1000 लोगों की आबादी पर एक भी डॉक्टर नहीं है। यही वजह है कि काम के दबाव में डॉक्टर एक मरीज को 2 मिनट भी नहीं दे पाते। हालात ये हैं कि देश की 1 लाख की आबादी सिर्फ 79 डॉक्टरों पर निर्भर है। वहीं गांवों के हालात तो और भी बुरे हैं।

दुख की बात है कि स्वास्थ्य (Health) इंसान की बुनियादी जरुरत है, लेकिन आजादी के 70 सालों बाद भी हमारी सरकार ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकी है, जहां सभी लोगों को उचित दामों पर इलाज मिल सके। यही वजह है कि सरकार की नाकामी का फायदा उठाकर आज देश में प्राइवेट अस्पतालों का जाल फैल गया है, जो अपने फायदे के लिए लोगों के इलाज में मनमानी कर रहे हैं !

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