धाकड़ लड़कियाँ : सामाजिक बुराइयों को ‘पैरों’ से किया परास्त !

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 3 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। एक जमाने में कहा जाता था कि ‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब और खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब।’ हालाँकि अब आज की उमंग और उत्साह से भरी नई पीढ़ी ने इस कहावत को सिर के बल उलट दिया है। हम किसी स्टार स्पोर्ट्स पर्सनालिटी की बात नहीं कर रहे हैं। हम ऐसी लड़कियों के हौसले और फैसले की बात कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से ना सिर्फ मैदान में जीत हासिल की है, बल्कि जीवन में भी सामाजिक बुराइयों पर अभूतपूर्व जीत दर्ज की है। सचमुच, यह लड़कियाँ मिसाल बनकर सामने आई हैं। आइए जानते हैं कौन हैं यह धाकड़ लड़कियाँ…

बाल विवाह की शिकार लड़की ने लड़ी सपनों की लड़ाई

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बिहार की राजधानी पटना से 14 किलोमीटर दूर स्थित फुलवारी शरीफ ब्लॉक के शोरामपुर गाँव की रहने वाली प्रतिमा की शादी 16 साल की उम्र में हो गई और फुटबॉल खिलाड़ी बनने का उसका सपना चकनाचूर हो गया। हालांकि प्रतिमा ने हार नहीं मानी और उसने ना सिर्फ अपने सपने को दूसरे तरीके से साकार किया, बल्कि अपनी फुटबॉल खेलने की हसरत को हथियार बनाकर बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ जंग भी छेड़ दी।

वह खुद भले ही फुटबॉल खिलाड़ी नहीं बन पाई, परंतु उसने अपने इलाके की तथा आसपास के गाँवों की 3,000 लड़कियों को फुटबॉल खिलाड़ी बना दिया। प्रतिमा अगर समाज, परिवार और व्यवस्था की सुनती तो घर में चूल्हा-चौका सँभाल रही होती, परंतु इस 16 साल की लड़की ने ना सिर्फ अपनी किस्मत बदली, बल्कि प्रदेश की भी 3,000 लड़कियों को सपनों की उड़ान भरने के लिये पंख दिये।

गौरव ग्रामीण महिला मंच की संस्थापक बनी प्रतिमा

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प्रतिमा 2013 से बाल विवाह की कुरीति के खिलाफ जंग और लड़कियों को फुटबॉल सिखाने के काम में जुटी है। उसने ‘गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच’ की स्थापना की है। उसने फुलवारी शरीफ ब्लॉक के सकरैचा, ढिबर, गोनपुरा, परसा तथा शोरमपुर पंचायतों के 15 से अधिक गाँवों की 3,000 से अधिक लड़कियों को फुटबॉल खेलना सिखाया है। प्रतिमा का कहना है कि बाल-विवाह का दंश उसने झेला है। उसने उस दर्द को अनुभव किया है। बाल-विवाह लड़कियों को उनके मूलभूत अधिकारों से दूर कर देता है। प्रतिमा का यह भी कहना है कि उसका उद्देश्य दलित और वंचित समुदाय की बेटियों को खेल के माध्यम से सशक्त और सबल बनाना है। प्रतिमा की संस्था में 10 लोग लड़कियों को फुटबॉल सिखाते हैं, इनमें 2 कोच और 8 सीनियर खिलाड़ी हैं। लड़कियों को फुटबॉल सिखाने में जो भी खर्च आता है, वह प्रतिमा खुद की कमाई से तथा चंदा इकट्ठा करके पूरा करती है। इसके अलावा यूनिसेफ जैसी संस्थाएँ भी अब उसकी मदद करती हैं। यूनिसेफ बिहार की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता कहती हैं कि लड़कियाँ खेल के माध्यम से समानता के अधिकार को प्राप्त कर सकती हैं। यह लड़कियाँ अन्य लड़कियों के लिये रोल मॉडल हैं। यह लड़कियाँ अपने परिवार की पहली पीढ़ी हैं, जो घर से बाहर निकली हैं और दूसरे राज्यों में खेलने जाती हैं। यह इन लड़कियों के लिये बहुत बड़ी बात है।

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