कभी जूते ख़रीदने के लिए पैसे नहीं थे, आज ADIDAS बढ़ाती है पैरों की शान ! जानिए हिमा दास के बारे में सब कुछ

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रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 26 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। क्रिकेट से इतर भी खेल की एक दुनिया है, जिसकी ओर ध्यान ध्यान देने के लिए एक 19 साल की लड़की ने पूरे देश को विवश कर दिया है। इस लड़की का नाम है हिमा दास। असम के नगाँव जिले के धिंग गाँव में 9 जनवरी, 2000 को जन्मीं हिमा दास आज भारत सहित पूरी दुनिया में छाई हुई हैं। धिंग एक्सप्रेस के नाम से पहले ही मशहूर भारतीय एथलीट हिमा दास को आज पूरा भारत गोल्डन गर्ल के रूप में सराह रहा है, क्योंकि उन्होंने 19 साल की आयु में 19 दिनों में 5 स्वर्ण पदक जीत कर पूरी दुनिया में न केवल भारत का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है, अपितु अन्य भारतीय एथलीटों को भी कुछ कर दिखाने के लिए प्रेरित किया है।

आज हम आपको भारतीय महिला धावक (RACER) हिमा दास से जुड़ा एक खास किस्सा बताने जा रहे हैं। यह वही हिमा दास हैं, जिनके पिता रणजीत दास तथा माता जोनाली दास के पास हिमा के जूते ख़रीदने के लिए पैसे नहीं थे और जो आज खेल का सामान बनाने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी ADIDAS के जूते पहनती हैं। देश की राजधानी दिल्ली से 2 हजार किलोमीटर दूर धिंग गाँव की इस बेटी के परिवार में 17 लोग हैं। पिता रणजीत और माता जोनाली दास की 6 संतानों में सबसे छोटी हिमा आज सफलता की बुलंदियों को छू रही हैं, क्योंकि उन्होंने इसी माह यानी जुलाई-2019 में यूरोप में अलग-अलग स्थानों पर आयोजित प्रतियोगिताओं में 5-5 गोल्ड मेडल जीते हैं। हिमा का परिवार धान की खेती पर निर्भर था।

फुटबॉलर बनना चाहती थीं हिमा

हिमा का सपना बचपन से ही फुटबॉलर बनने का था, परंतु स्कूली मैदान में हिमा की स्फूर्ति देख कर एक टीचर ने एथलेटिक्स में करियर बनाने की सलाह दी। हिमा ने रेस का चयन किया। इसी दौरान स्थानीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में हिमा ने शानदार प्रदर्शन किया, जो कोच निपोन दास की नज़र में आ गया। निपोन ने हिमा को रेस की दुनिया में दम दिखाने का हौसला दिया। इसके बाद हिमा ने गुवाहाटी में राज्य स्तरीय चैम्पियनशिप में भाग लिया, पर कांस्य पदक ही जीत पाईं। फिर उन्हें जनियर नेशनल चैम्पियनशिप में भेजा गया। ट्रेनिंग और अनुभव के अभाव के बावजूद हिमा इस चैम्पियनशिप में 100 मीटर की रेस में फाइनल तक पहुँची, लेकिन हार जाने के कारण कोई मेडल हाथ नहीं आया। हिमा हताश हो गईं।

निपोन की ज़िद ने बनाया हिमा को

यहाँ एक उज्ज्वल भविष्य का अंत हो सकता था, परंतु तभी निपोन हिमा के पीछे हिमालय की तरह डट गए और उन्होंने हिमा को गुवाहाटी ट्रेनिंग के लिए भेजने की ठान ली। हिमा के घर वाले इनकार कर रहे थे, परंतु निपोन की ज़िद के आगे उन्होंने हाँ कर दी। धिंग से रोजाना गुवाहाटी ट्रेनिंग के लिए आना-जाना ग़रीब परिवार को महंगा लग रहा था। ऐसे में कोच निपोन दास ने गुवाहाटी में ही हिमा के रहने की व्यवस्था करवाई और हिमा की राह और आसान हो गई। हिमा की ट्रेनिंग अच्छी चल रही थी, परंतु ट्रेनिंग के लिए अच्छे जूतों की ज़रूरत थी। हिमा ने कभी पिता को अपनी यह ज़रूरत नहीं बताई, लेकिन एक दिन जब पिता रणजीत दास गुवाहाटी पहुँचे, तो उन्हें जूतों की ज़रूरत का पता चला, परंतु हिमा के लिए आवश्यक जूतों की कीमत करीब 1200 रुपए थी। पिता रणजीत दास के लिए यह रकम बड़ी थी, परंतु उन्होंने जमा करके रखी गई पूंजी में से 1200 रुपए हिमा को दिए और हिमा ने ट्रेनिंग के लिए जूते ख़रीदे, परंतु आपको जान कर आश्चर्य होगा कि कभी जूतों के लिए रुपयों की किल्लत का अनुभव करने वाली हिमा की हिम्मत ने आज उन्हें इस मुकाम पर ला खड़ा किया कि अब उनके पैरों में एडिडास कंपनी के जूते होते हैं।

एडिडास को हिमा में दिखा उज्ज्वल भविष्य

अप्रैल-2018 में गोल्ड कोस्ट में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में हिमा ने 400 मीटर दौड़ में छठा और 4 गुणा 400 मीटर दौड़ में सातवाँ स्थान हासिल किया। फिर इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन (IAAF) विश्व अंडर 20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में 400 मीटर की दौड़ में हिमा ने स्वर्ण पदक जीता। यह दौड़ हिमा ने 51.46 सेकेंड में पूरी की और इस रिकॉर्ड दौड़ के बाद हिमा विश्व स्तर पर ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। इसके बाद हिमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इसी बीच इस उभरती प्रतिभाशाली एथलीट पर नज़र पड़ी एडिडास कंपनी की। जर्मन स्पोर्ट्स ब्रांड कंपनी एडिडास की भारतीय शाखा ने सितम्बर-2018 में न केवल हिमा दास को अपना ब्रांड एम्बेसेडर बनाया, अपितु उनके दोनों पैरों के लिए जूते भी बनाए, जिसमें वे 12 उंगलियाँ आराम से डाल सकती हैं।

खेल के लिए परीक्षा छोड़ी

हिमा दास उस समय धर्म संकट में पड़ गईं, जब ऑस्ट्रेलिया में कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 का आयोजन हुआ। टूर्नामेंट 4 से 15 अप्रैल के बीच था और उसी दौरान हिमा की बोर्ड परीक्षाएँ थीं। घर वालों ने हिमा से कहा कि परीक्षा तो अगले साल भी दी जा सकेगी, परंतु कॉमनवेल्थ गेम में खेलने का मौका चार साल बाद मिलेगी। हिमा ने खेल चुना और परीक्षा छोड़ दी। यद्यपि 2019 में वे असम बोर्ड की बारहवीं की परीक्षा देकर फर्स्ट डिवीज़न में उत्तीर्ण हुईं।

और हिमा ने रच दिया इतिहास

12 जुलाई, 2018 को हिमा दास ने एक ऐसा इतिहास रचा, जो पूरे भारत का सीना गौरव से चौड़ा कर गया। फिनलैण्ड के ताम्पेर में वर्ल्ड अंडर 20 चैम्पियनशिप में हिमा ने 400 मीटर की रेस में 511.46 सेकेंड का समय लेकर जो गोल्ड मेडल जीता। यह किसी भी अंडर 19 विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में भारत का पहला गोल्ड मेडल था।

सबसे बड़ी परीक्षा 2020 में

हिमा के कैरियर की सबसे बड़ी परीक्षा 2020 में होगी, जब टोक्यो में ओलम्पिक खेल आयोजित होंगे। इस प्रतियोगिता में क्वॉलीफाई करने के मानदंड काफी कठिन हैं। 200 मीटर में क्वॉलीफाई करने के लिए 22.80 सेकेंड, जबकि 400 मीटर के लिए 51.35 सेकेंड के मानक तय हैं। वैसे हिमालय के लिए यह मुश्किल नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे एशियन गेम्स 2018 में 400 मीटर की रेस 50.79 सेकेंड में पूरी करने का कारनामा कर चुकी हैं। उनका अगला लक्ष्य 50 सेकेंड के अंदर 400 मीटर रेस पूरी करना है।

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