इस 24 साल की लड़की ने पूरा किया था गीता फोगाट का सपना

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 3 सितम्बर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में भले ही क्रिकेट को लेकर दीवानगी होगी, परंतु दुनिया की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलम्पिक खेलों को माना जाता है, जिसका इतिहास 123 वर्ष पुराना है। ओलंपिक खेलों का आयोजन अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक परिषद् (IOC) करती है। आईओसी ने प्रथम ओलंपिक खेल प्रतियोगिता वर्ष 1896 में ग्रीस साम्राज्य के एथेंस में आयोजित की थी, जिसे एथेंस ओलंपिक भी कहा जाता है। किसी भी देश के खेल कौशल की असली परीक्षा ओलंपिक खेलों में ही होती है। ओलंपिक खेलों की पदक तालिका हर देश के खेल कौशल को व्यक्त करती है। इस पदक तालिका में जो देश सबसे ऊपर रहता है, उसकी पूरी दुनिया सराहना करती है और जिन देशों के नाम नीचे के पायदानों से शुरू होते हैं, उन देशों को खेल की दुनिया में फिसड्डी माना जाता है।

जहाँ तक भारत का प्रश्न है, तो हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी है, परंतु यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में न तो हॉकी को लेकर कोई क्रैज़ है और न ही विशेष लोकप्रियता। 136 करोड़ की आबादी वाले भारत में बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी के बारे में अधिक जानकारी होगी या वे हॉकी के खेल को पूरी तरह समझते होंगे। यहाँ स्मरण रहे कि हम क्रिकेट की लोकप्रियता की आलोचना नहीं कर रहे, परंतु देश में क्रिकेट की दीवानगी के चलते अन्य खेलों की हो रही उपेक्षा को उजागर करना चाहते हैं।

वैसे हम आज देश में क्रिकेट से इतर अन्य खेलों को बढ़ावा देने के विषय में बात नहीं करने जा रहे। हम पुन: विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलंपिक पर लौटते हैं और उसमें भारत की भागीदारी और उपलब्धि की बात करते हैं। जहाँ तक भारत और ओलंपिक का प्रश्न है, तो भारत ने ओलंपिक खेल शुरू होने के 14 वर्ष बाद यानी वर्ष 1900 में पहली बार अपना एक एथलीट भेजा था। भारत पहली बार ओलंपिक खेलों का अधिकृत रूप से हिस्सा बना वर्ष 1920 में। यही वह वर्ष था, जब आईओसी में भारत के दो प्रतिनिधि सर दोराब टाटा और तत्कालीन बॉम्बे के गवर्नर जॉर्ज लॉयड शामिल हुए और बेल्ज़ियम के एंटवर्प में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलंपिक प्रतियोगिता 1920 में भारत ने 6 प्रतियोगियों को भेजा, जिनमें 4 एथलीट, 2 पहलवान और 2 प्रबंधक सोहराब भूत तथा फयज़ी शामिल थे।

जब साक्षी ने रच दिया इतिहास

अब मूल मुद्दे पर आते हैं। आज हम जिस महिला की बात करने जा रहे हैं, उनका नाम है साक्षी मलिका। भारतीय महिला पहलवान (WRESTLER) साक्षी मलिक का आज 27वाँ जन्म दिवस है। 3 सितम्बर, 1992 को हरियाणा के रोहतक में जन्मीं साक्षी मलिक के नाम कई उपलब्धियाँ दर्ज हैं, परंतु सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि साक्षी मलिक ओलंपिक में पदक जीतने वाली प्रथम भारतीय महिला पलवान हैं। वर्ष 2016 में 24 वर्षीय साक्षी ने ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो में आयोजित रियो ओलंपिक (RIO OLYMPICS) में महिला कुश्ती में किर्गीज़स्तान के Aisuluu Tynybekova (जो एशियन चैम्पियन थे) को हरा कर भारत के लिए कांस्य पदक जीता था। इस तरह साक्षी ने ओलंपिक में महिला पहलवानी में भारत को पहला पदक दिला कर इतिहास रचा था। दिलचस्प बात यह है कि रेपचेज़ प्रणाली के तहत आयोजित खेले गए इस सेमी फाइनल मुक़ाबले साक्षी आरंभ में 5-0 से पीछे चल रही थीं, परंतु बाद में धमाकेदार वापसी करते हुए उन्होंने एशियन चैम्पियन को 7-5 से हरा कर कांस्य पदक अपने नाम कर लिया और महिला पहलवानी में भारत को पहला पदक दिलाया। साक्षी को यह उपलब्धि यूँ ही हासिल नहीं हुई। उन्होंने रियो ओलंपिक में क्वॉलीफाई करने के लिए कड़ी मेहनत की और मई-2016 में हुए क्वॉलीफाइंग मुक़ाबले में चीन की झांग लैन को हरा कर ओलंपिक के लिए क्वॉलीफाई किया था। इसके बाद ओलंपिक में उन्होंने स्वीडन की जोहाना मैट्सन तथा मोलडोवा की मारियाना चेर्डिवारा को हराया। यद्यपि क्वॉर्टरफाइनल मुक़ाबले में वे रूस की वेलरिया कोब्लोवा से हार गईं, परंतु साक्षी ने रेपचेज़ राउंड में मंगोलिया की पुर्वडोरीजीन ओरखोन को हराया और अंत में किर्जीज़स्तान को हरा कर भारत के लिए महिला पहलवानी में पहला पदक जीता।

दादा से प्रेरणा और दादा का ही विरोध

ओलंपिक में भारतीय महिला पहलवानों के भाग लेने का सिलसिला 2012 में आरंभ हुआ। हरियाणा के भिवानी जिले के छोटे से गाँव बलाली में 15 दिसम्बर, 1988 में जन्मीं गीता फोगाट ने 2012 में लंदन में आयोजित ओलंपिक के लिए क्वॉलीफाई कर पहली बार ओलंपिक में भारतीय महिला पहलवानी का ज़ौहर दिखाया। गीता पर फिल्म दंगल भी बन चुकी है। गीता ने अन्य कई प्रतियोगिताओं में स्वर्ण से लेकर कांस्य पदक जीते, परंतु ओलंपिक में गीता कोई पदक नहीं जीत सकीं। गीता फोगाट का यह सपना साक्षी मलिक ने ही पहली बार 2016 में महिला पहलवानी में भारत को पहला पदक दिला कर पूरा किया। साक्षी मलिक यूँ ही महिला पहलवान नहीं बन गईं। उन्हें अपने समाज और परिवार में भारी विरोध का सामना करना पड़ा। दरअसल साक्षी बचपन में अपने दादा दादा बदलूराम के साथ रहती थीं। साक्षी ने अपने बचपन में खेल तो कबड्डी और क्रिकेट जैसे खेले, परंतु उन्हें पहलवान बनने की प्रेरणा अपने दादा बदलूराम से मिली, जो अपने इलाके (रोहतक के पास स्थित मोखरा गाँव) के मशहूर पहलवान थे। उन्हें हर कोई पहलवानजी कह कर ही बुलाता था। दादा को मिलने वाले पहलवानजी संबोधन को सुन कर 7 वर्षीय मासूम साक्षी आनंद से भर जातीं और इसी बात ने उनके मन में पहलवान बनने का संकल्प पैदा किया। 7 साल तक दादा के साथ रहने के बाद साक्षी दादा की तरह पहलवान बनने के इरादे के साथ अपनी माँ के पास लौट आईं। माँ ने जब साक्षी की इच्छा सुनी, तो वह चौंक उठीं। पिता और दादा ने भी साक्षी का विरोध किया, क्योंकि उन्हें डर था कि कुश्ती के चक्कर में कहीं उसके हाथ-पैर न टूट जाएं। सभी लोगों ने साक्षी को बहुत समझाया, पर साक्षी टस से मस नहीं हुई। और अंतत: साक्षी के घर वाले उसे कुश्ती की ट्रेनिंग देने के लिए तैयार हो गए।

पीछे मुड़ कर नहीं देखा साक्षी ने

साक्षी मलिक ने ट्रेनिंग शुरू की और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उन्होंने ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2014 में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए रजत पदक जीता, तो विश्व कुश्ती प्रतियोगिता 2014 में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। दोहा में आयोजित एशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप 2015 में साक्षी ने कांस्य पदक जीता। इससे पहले साक्षी ने जूनि.यर नेशनल-जम्मू 2011 में स्वर्ण पदक, जूनियर नेशनल-जकार्ता 2011 में कांस्य पदक, सीनियर नेशनल-गोंडा 2011 में रजत पदक, ऑल इंडिया युनिवर्सिटी-सिरसा 2011 में स्वर्ण पदक, जूनियर नेशनल–देवघर 2012 व जूनियर एशियन-कज़ाकिस्तान 2012 में स्वर्ण पदक, सीनियर नेशनल-गोंडा 2012 में कांस्य पदक, ऑल इंडिया युनिवर्सिटी-अमरावती 2012 व सीनियर नेशनल-कोलकाता 2013 में स्वर्ण पदक और ऑल इंडिया युनिवर्सिटी चैम्पियनशिप-मेरठ 2014 में स्वर्ण पदक जीता। साक्षी के पिता सुखबीर मलिका जाट डीटीसी में बस कंडक्टर हैं और माँ सुदेश मलिक एक आँगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। साक्षी को भारत सरकार ने 2017 में अपने चौथे उच्चतम् राष्ट्रीय सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया। 2016 में उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया। इसके अलावा साक्षी पर भारतीय रेलवे, भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) , दिल्ली खेल मंत्रालय, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश राज्यों, जेएसडब्ल्यू ग्रुप, राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (INLD) आदि निकायों से भारी पुरस्कार राशि मिली। रेलवे ने उन्हें नौकरी भी दी और बाद में राजपत्रित अधिकारी रैंक में पदोन्नति दी। हरियाणा सरकार ने 500 स्क्वेयर यार्ड भूमि प्रदान की।

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