जानिए भारत का प्राचीन चतुरंग कैसे बना आज का शतरंज ?

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 13, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। शतरंज ! काले और श्वेत रंग के चौखानों वाले पट पर खेला जाने वाला, यह खेल बहुत ही रोचक और मनोरंजक लगता है। दो खिलाड़ियों के बीच खेली जाने वाली यह प्रतिस्पर्धा देखने वालों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। शतरंज के खेल के वर्तमान भारतीय महारथी विश्वनाथन आनंद से तो आप भली-भाँति परिचित ही हैं। पाँच बार के विश्व शतरंज विजेता विश्वनाथन आनंद ने भारत में शतरंज के खेल को एक नया आयाम और पहचान दी है। आज बच्चा-बच्चा इस खेल से प्रभावित और इसे सीखने की ओर अग्रसर है। शतरंज की कंप्यूटर गेम के माध्यम से भी लोग इस खेल से जुड़ चुके हैं। आज हर किसी के फोन में शतरंज की गेम तो अवश्य होती ही है। यहाँ एक ओर क्रिकेट का क्रेज सबसे ज्यादा देखा जाता है, वहीं विश्वनाथन आनंद ने युवाओं को शतरंज के खेल में भी रुचि लेना सिखा दिया है। आज हम शतरंज की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि 19 वर्ष पहले आज ही के दिन यानी 13 सितंबर, 2000 को विश्वनाथन आनंद ने शेनयांन में पहला फ़िडे शतरंज विश्व कप जीत कर इतिहास रचा था। हालाँकि आज हम आपको विश्वनाथन आनंद के विषय में नहीं, अपितु उनके खेल शतरंज के बारे में कुछ ऐसे रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं, जिन्हें जानने के बाद आप शतरंज के खेल को और अधिक पसंद करने लगेंगे। आइए पहले जानते हैं कि शतरंज की शुरुआत कहाँ से हुई ?

सतयुग से खेला जा रहा है ‘चतुरंग’

भारत में शतरंज का अस्तित्व सतयुग से माना जाता है। रामायण में उल्लेख है कि रावण का मनोरंजन करने के लिए उसकी पत्नी मंदोदरी ने शतंरज का खेल प्रारंभ किया था। रावण जब युद्ध से लौटता था, तो मंदोदरी उसका मनोरंजन करने के लिए उसके साथ शतरंज खेलती थी। उस समय इसे चतुरंग कहा जाता था। आधुनिक शतरंज शोगी (जापानी शतरंज) और मकरक यानी (थाई शतरंज) चतुरंग का ही आधुनिक रूप माना जाता है। शतरंज की शुरुआत के पीछे प्राचीन भारतीय संगठित सेना को भी माना जाता है। दरअसल प्राचीन भारतीय संगठित सेना, जिसे उस दौर में चतुरंगिणी नाम से पुकारा जाता था, उसमें चार अंग – हस्ती, अश्व, रथ, पदाति होते थे। सेना की सबसे छोटी टुकड़ी (इकाई) ‘पत्ति’ कहलाती थी, जिसमें एक गज, एक रथ, तीन अश्व, पाँच पदाति होते थे। ऐसी तीन पत्तियाँ सेनामुख कहलाती थीं। इस प्रकार तीन-तीन गुना करके यथाक्रम गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी का संगठन किया जाता था। 10 अनीकिनी एक अक्षौहिणी के बराबर होती थी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ऐसी ही 18 अक्षौहिणी सेना का उल्लेख मिलता है।

भारत से ईरान पहुँच कर बना ‘शातरंज’

शतरंज का खेल भारतवर्ष से निकला और प्राचीन फारस (ईरान) पहुँचा, ईरान से अरब और अरब से यूरोपीय देशों में खेला जाने लगा। फारसी में इसे चतुरंग और अरब में इसे शातरंज नाम से पुकारा जाता है। चतुरंग पर संस्कृत में अनेक ग्रंथ मिलते हैं। इनमें चतुरंगकेरली, चतुरंगक्रीडन, चतुरंगप्रकाश और चतुरंगविनोद नामक चार ग्रंथ प्रमुख हैं। सात सौ वर्ष पूर्व हुए त्रिभंगाचार्य नामक एक दक्षिणी विद्वान्, जो शतरंज में बहुत निपुण थे, उन्होंने अपने उपदेश में भी इस खेल का उल्लेख किया था। पहले शतरंज में चार रंगों का प्रयोग होता था, हाथी, घोड़ा, नौका और बट्टे (पैदल) इसके प्रमुख भाग थे। छठी शताब्दी में जब यह खेल ईरान से अरब पहुँचा, तो इसमें ऊँट और वजीर शामिल किए गए। तिथितत्व नामक ग्रंथ में भी वेदव्यास द्वारा युधिष्ठिर को शतरंज खेल की विद्या सिखाने का उल्लेख किया गया है, जिसमें चित्रपट (बिसात) ६४ घरों का होता था, जिसके चारों ओर खेलने वाले बैठते थे, प्रत्येक खिलाड़ी के पास एक राजा, एक हाथी, एक घोड़ा, एक नाव और चार बट्टे या पैदल होते थे। पूर्व की ओर की गोटियाँ लाल, पश्चिम की पीली, दक्षिण की हरी और उत्तर की काली होती थीं। खेलने की रीति आजकल के जैसी ही होती थी, परंतु हार जीत कई प्रकार से होती थी। जैसे, सिंहसन, चतुराजी, नृपाकृष्ट, षट्पद काककाष्ट, बृहन्नौका इत्यादि।

आज़ादी से पहले भारत के मीर सुल्तान खान थे चेस खिलाड़ी

आधुनिक युग में शतरंज एक चौपाट (बोर्ड) के ऊपर दो व्यक्तियों के लिये बना खेल है। चौपाट के ऊपर कुल 64 खाने या वर्ग होते हैं, जिनमें 22 चौरस काले या अन्य रंग के और 32 चौरस सफेद या अन्य रंग के होते हैं। खेलने वाले दोनों खिलाड़ी भी सामान्यतः काला और सफेद कहलाते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी के पास एक राजा, एक वजीर, दो ऊँट, दो घोडे, दो हाथी और आठ सैनिक होते हैं।

भारत के पहले प्रमुख खिलाड़ी मीर सुल्तान खान ने इस खेल को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दिया। 1928 में 9 में से 8.5 अंक बना कर उन्होंने अखिल भारतीय प्रतियोगिता जीती थी और लगातार तीन बार ब्रिटिश प्रतियोगिता जीती थी। उन्होंने हेस्टिंग्स प्रतियोगिता में क्यूबा के पूर्व विश्व विजेता जोस राऊल कापाब्लइंका को हराया था और भविष्य के विजेता मैक्स यूब और उस समय के कई अन्य शक्तिशाली ग्रैंड मास्टरों पर भी विजय पाई थी। उन्हें विश्व के 10 सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक माना जाता था। सुल्तान ब्रिटिश दल के लिए 1930 (हैंबर्ग), 1931 (प्राग) और 1933 (फोकस्टोन) ओलंपियाड में भी खेले थे। मैनुएल एरोन ने 1961 में एशियाई स्पर्धा जीत कर अंतर्राष्ट्रीय मास्टर का दर्जा प्राप्त किया था और वे भारत के प्रथम आधिकारिक शतरंज खिताबधारी बने थे। शतरंज में वह पहले अर्जुन पुरस्कार विजेता भी थे।

विश्वनाथन आनंद बने भारत के प्रथम ग्रैंड मास्टर

1979 में बी. रविकुमार तेहरान में एशियाई जूनियर स्पर्धा जीत कर भारत के दूसरे अंतर्राष्ट्रीय मास्टर बने थे। इंग्लैंड में 1982 की लायड्स बैंक शतरंज स्पर्धा में प्रवेश करने वाले 17 वर्षीय दिव्येंदु बरुआ ने विश्व के द्वितीय क्रम के खिलाड़ी विक्टर कोर्च्नोई पर सनसनीखेज जीत हासिल की थी। विश्वनाथन आनंद के विश्व के सर्वोच्च खिलाड़ियों में से एक के रूप में उदय होने के बाद भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी उपलब्धियां हासिल की हैं। 1987 में विश्व जूनियर स्पर्धा जीतकर विश्वनाथन शतरंज के पहले भारतीय विश्व विजेता बने। इसके बाद उन्होंने विश्व के अधिकांश प्रमुख खिताब जीते हैं। 1987 में आनंद भारत के पहले ग्रैंड मास्टर बने। आनंद को 1999 में फीडे अनुक्रम में विश्व विजेता गैरी कास्पारोव के बाद दूसरा क्रम दिया गया है। विश्वनाथन आनंद पांच बार (2000, 2007, 2008, 2010 और 2012 में) विश्व चैंपियन रह चुके हैं। ग्रैंड मास्टर विश्वनाथन आनंद को 1998 और 1999 में प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था। आनंद को 1985 में प्राप्त अर्जुन पुरस्कार के अलावा, 1988 में पद्मश्री व 1996 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार मिला था। सुब्बारमन विजयलक्ष्मी व कृष्णन शशिकिरण को भी फीडे अनुक्रम में स्थान मिला है। इसके बाद से भारत में ग्रैंड मास्टर्स की लाइन लग गई है। 1991 में दिव्येंदु बरुआ और 1997 में प्रवीण थिप्से, 2001 में पंटाला हरिकृष्ण और महिला खिलाड़ियों में 2002 में कोनेरू हम्पी और 2003 में आरती रमास्वामी ग्रैंड मास्टर बनीं।

विश्व भर में इस खेल का नियंत्रण फेडरेशन इन्टरनेशनल दि एचेस (Fédération Internationale des Échecs or International Chess Federation ) यानी फिडे द्वारा किया जाता है। फिडे का गठन 95 वर्ष पूर्व 20 जुलाई, 1924 को फ्रांस के पेरिस में किया गया था। शतरंज से जुड़ी सभी प्रतियोगिताएं फिडे के क्षेत्राधिकार में आती हैं और खिलाड़ियों को संगठन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार क्रम दिया जाता है। विश्व स्तर की उत्कृष्टता प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को “ग्रैंड मास्टर” की उपाधि दी जाती है। भारत में शतरंज खेल का नियंत्रण अखिल भारतीय शतरंज महासंघ (All India Chess Federation) यानी एआईसीएफ द्वारा किया जाता है, जो 1951 में स्थापित किया गया है।

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