खुशियों की तलाश में भटकती जिंदगी…

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Be happy and keep everyone smiling

जिंदगी को लेकर लोगों की अपनी-अपनी राय है। कुछ लोगों के लिए जिंदगी एक जंग का मैदान है जहां हमेशा लड़ना होता है। कुछ लोगों के लिए जिंदगी एक जुआ है जिसमें कभी हार है और कभी जीत है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जिंदगी को तोहफा समझते हैं और हर पल खुशियों के साथ गुजारना चाहते हैं और गुजारते भी हैं। वे फिक्रमंद होते हुए भी बेफिक्रों की तरह अपनी जिंदगी जीते हैं।

 जिंदगी मशीन की तरह नहीं होनी चाहिए

इन सब के बीच गौर से देखिए तो ज्यादातर लोगों की जिंदगी एक पैटर्न की तरह है। सुबह टेंशन में उठना, ऑफिस के लिए जल्दी तैयार होना, दिन भर ऑफिस में काम करना और वापस घर लौटकर इस सोच के साथ सो जाना कि अगले दिन फिर से ऑफिस जाना है। मतलब इनकी जिंदगी एक मशीन की तरह है। यह दुखद है कि आजकल ज्यादातर लोगों की जिंदगी ऐसी ही हो गई है।

जज्बात जाहिर करने में संकोच कैसा ?

कहने के लिए हम तो एक इंसान हैं लेकिन हमारा व्यवहार एक रोबोट जैसा हो गया है। हमारी फिलिंग मरती जा रही है। हम खुद के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। कम शब्दों में कहें तो रोबोट की तरह हमें कमांड दिया जाता है और बिना सोचे समझे हम वो काम करते हैं या फिर करने के लिए मजबूर होते हैं।

 पैसों से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती

खासकर महानगरों में रहने वाले युवाओं की हालत कुछ ऐसी ही हो गई है। चकाचौंध की दुनिया में हर कोई दिखावा करता है कि वह खुश है। लेकिन ऐसे खुशनसीब बहुत कम हैं जो वाकई अपनी जिंदगी से खुश हैं। महानगरों के ज्यादातर युवा बदलते दौर की रेस में पिछड़ रहे हैं जिसका असर उनकी निजी जिंदगी पर साफ तौर पर देखा जा सकता है। हमारी जिंदगी में सुविधा और साधन बढ़ें हैं इसके बावजूद हम खुश नहीं हैं। एक महीने मे 10 हजार कमाने वाला भी खुश नहीं है, 1 लाख रुपए कमाने वाला भी खुश नहीं है वही हाल 10 लाख कमाने वालों की भी है।

सच्ची मुस्कान ही असली खुशी है

आजकल जिसे हम लाइफस्टाइल कहते हैं दरअसल वह एक दिखावा है जिसे दिखाकर हम ये जताने की कोशिश करते हैं कि हम खुश हैं। आपको अगर इन बातों पर यकीन नहीं है तो आप घर से बाहर निकल कर बाजारों में जाकर देखिए। मेट्रो में सफर करते वक्त पाएंगे कि ज्यादातर युवा बहुत जल्दी में होते हैं और भावशून्य भी होते हैं। उन्हें ऑफिस पहुंचने की जल्दी है और अपने बॉस को गाली दे रहे होते हैं। दरअसल वे उत्पीड़ित हैं।

खुश होने के लिए वजह की तलाश ना करें

हम अपनी डेली रूटीन वाली जिंदगी से खुश नहीं हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि शनिवार को ऑफिस से निकलते वक्त जो खुशियां हमारे चेहरे पर होती है वह खुशी सोमवार को ऑफिस पहुंचते वक्त नहीं होती है। क्योंकि हम किसी न किसी रूप में मानसिक रूप से गुलाम बन चुके हैं। वो पल बहुत कम रह गए हैं जहां हम अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीते हैं और बेहद खुश रहते हैं।

खुशियां हमारे भीतर है, बाहर नहीं

ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर हम कैसे खुश रह सकते हैं ? दरअसल हमें अपनी जिंदगी में छोटी-छोटी खुशियां तलाशनी होगी क्योंकि ये बाजारों में नहीं मिलती। हमें अपने बिजी लाइफ से खुद के लिए वक्त निकालना होगा। हमें पहचानना होगा उन चीजों को जो हमारे चेहरे पर प्यारी मुस्कान लाती हैं। जिंदगी को लेकर सकारात्मक सोच अपनानी होगी। खुद को कैद मुक्त करना होगा। अगर आपकी जिंदगी खुली किताब की तरह होगी तो विचारों का बोझ हल्का होगा। मशहूर कहावत है कि खुशियां बांटने से बढ़ती है और दुख बांटने से कम होता है। इसलिए खुश रहें और अपने आसपास के लोगों को खुश रखें।

 

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Youth Corner · Yuva Exclusive

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