दीपा करमाकरः अभावों के बावजूद बुलंदी तक का सफर

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Dipa Karmakar

हमारे देश में जब खेलों की बात आती है तो सिर्फ  क्रिकेट पर ही ध्यान जाता है। भारत में क्रिकेट की आभा ऐसी है कि बाकी सारे खेल उसकी चमक में कहीं खो से जाते हैं। हालांकि अब कॉरपोरेट कल्चर के आने के बाद से भारत में फुटबॉल, बैडमिंटन, टेनिस और कुश्ती जैसे पारंपरिक खेलों को भी दर्शक मिलने लगे हैं। लेकिन जिमनास्टिक की बात करें तो आज भी भारत में बड़ी आबादी इस खेल से अंजान है। ऐसे हालात में भी भारतीय जिमनास्ट दीपा करमाकर ने अपनी मेहनत और लगन के बूते रियो ओलंपिक में पूरी दुनिया को चौंका दिया था। बता दें कि सरकार द्वारा कोई खास मदद और ट्रेनिंग की बेहतर सुविधाएं ना होने के बावजूद दीपा मामूली अंतर से रियो ओलंपिक में पदक जीतने से चूक गई थी और चौथे स्थान पर रही थी।

संघर्षों से भरी राह

दीपा का जन्म त्रिपुरा राज्य में हुआ। 5 साल की उम्र में दीपा ने जिमनास्टिक सीखना शुरु कर दिया था। दीपा की मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बचपन में दीपा के पैर सपाट थे और जिमनास्टिक में सपाट पैर बड़ा ही नकारात्मक पहलू माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद दीपा और उसके कोच बिश्वेशवर नंदी ने काफी मेहनत कर इस कमी पर काबू पा लिया। दीपा 5 साल की उम्र से ही बिश्वेशवर नंदी से कोचिंग ले रही है और आज 17-18 साल  बीतने के बावजूद भी बिश्वेशर नंदी ही दीपा के कोच हैं।

Dipa Karmakar

दीपा का कहना है कि उनके कोच बिश्वेशवर नंदी काफी सख्त हैं और उनकी डांट से कई बार वह रोयी भी हैं, लेकिन वह ये भी जानती है कि कोच उनकी बेहतरी के लिए ही उन्हें डांटते हैं। एक ऐसे इलाके में जो कि बाढ़ से भी प्रभावित रहता है, वहां बिना स्पॉन्सर और सरकारी मदद के दीपा करमाकर का रियो ओलंपिक में चौथे नंबर तक का सफर काफी प्रेरणादायक रहा है। दीपा रियो ओलंपिक में पदक भले ही ना जीत पायी हों, लेकिन उनके प्रदर्शन ने करोड़ो भारतीयों को गौरवान्वित जरूर किया है।

आज पूरे भारत में दीपा करमाकर के कारण ही शायद जिमनास्टिक की पहचान है। बता दें कि साल 2007 में जूनियर नेशनल चैंपियनशिप समेत दीपा अभी तक 77 मेडल जीत  चुकी है। हैरानी की बात है कि इन 77 मेडल में से 67 सिर्फ गोल्ड मेडल हैं। इसमें 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स और हिरोशिमा एशियन चैंपियनशिप का कांस्य पदक भी शामिल है। अब इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिलहाल भारत में दीपा करमाकर को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। वहीं साल 2016 में हुए रियो ओलंपिक में चौथे स्थान पर आकर दीपा ने पूरी दुनिया की प्रशंसा बटोरी थी।

Dipa Karmakar

दीपा की कामयाबी के पीछे उनकी मेहनत और समर्पण है, जिसे उन्होंने आज तक बरकरार रखा है। बता दें कि दीपा ने पिछले कई सालों से मिठाई को हाथ तक नहीं लगाया है और रोजाना 8 घंटे ट्रेनिंग करती हैं। दीपा अपनी डाइट और ट्रेनिंग पर भी पूरा ध्यान रखती है। यही कारण है कि भारत को अपनी इस बेटी से अगले ओलंपिक में एक पदक की आस जरुर होगी।

गौरतलब है कि दीपा प्रतिभावान होने के साथ ही शेरदिल भी है, तभी वह जिमनास्टिक की सबसे खतरनाक मानी जाने वाली विधा Produnova में हाथ आजमाने वाली दुनिया की सिर्फ पांचवी खिलाड़ी हैं। रियो ओलंपिक की जिमनास्टिक में स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी साइमोन बाइल्स ने भी दीपा करमाकर की तारीफ की थी।

Dipa Karmakar

दीपा करमाकर की कहानी प्रेरणा है, ऐसे खिलाड़ियों के लिए जो सरकारी मदद ना मिलने का रोना रोते रहते हैं। क्योंकि दीपा ने बिना किसी खास सरकारी मदद और स्पॉन्सरशिप के ही, अपनी मेहनत, लगन और समर्पण के दम पर जिमनास्टिक के खेल में भारत को पहचान दिलाई है और उम्मीद है कि भविष्य में ओलंपिक पदक भी दिलाएंगी। लेकिन ये भी कहना चाहेंगे कि ओलंपिक पदक आए या ना आए, लेकिन दीपा करमाकर देश की युवा पीढ़ी के लिए हमेशा प्रेरणास्त्रोत रहेंगी।

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Sports · Youth Corner · Youth Icons

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