Freedom of Expression की सीमा क्या हो..?

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Freedom of Expression

हमारे देश में Freedom of Expression को लेकर लंबी-चौड़ी बहस चलती रहती है। अधिकांशतः यह बहस देश के पक्ष में बोलने और देश के खिलाफ बोलने पर ज्यादा केन्द्रित हो जाती है। कुछ समय पहले देश की कुछ प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में Freedom of Expression के नाम पर देश-विरोधी नारे लगाए गए, जिन्हें लेकर काफी बवाल हुआ। मामले को लेकर राजनीति हो गई और कई लोगों ने इस दौरान काफी टीआरपी बटोरी। दोनों ही पक्षों के अपने अपने तर्क थे और दोनों के तर्कों में हमारी जिज्ञासा को शांत करने की क्षमता भी थी। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर वो सीमा क्या हो, जहां तक लोग अपने Freedom of Expression का इस्तेमाल कर सकें ? ऐसे कई विषय हैं, जिन्हें लेकर हाल के दिनों में Freedom of Expression का खूब इस्तेमाल किया गया, लेकिन वह किस हद तक सही था, यह अभी तक सवालों के घेरे में है !

Freedom of Expression

धार्मिक आजादी

 

हमारे समाज पर फिल्मों का गहरा प्रभाव है, सिनेमा समाज के बीच से ही निकलता है और समाज भी सिनेमा से प्रभावित होता रहा है। यही वजह है कि सिनेमा हमारे देश में अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम है। पिछले कुछ सालों में ऐसी कई फिल्में आयी हैं, जिनमें एक धर्म विशेष के कर्मकांडो और उनकी मान्यताओं पर प्रहार किया गया है। अच्छी बात ये है कि ये फिल्में पसंद भी की गई हैं और बिजनेस के मामले में भी काफी सफल रही। हालांकि कुछ संगठनों ने सिर्फ एक धर्म विशेष की आलोचना करने पर सवाल भी उठाए, तो फिल्मकारों या बुद्धिजीवियों द्वारा इसे Freedom of Expression कहकर नकार दिया गया। लेकिन ये बात कहां तक सही कही जा सकती है कि किसी एक धर्म को ही हर बार निशाना बनाया जाए। हम मानते हैं कि फिल्मकारों ने जो दिखाया है, उन तथ्यों में दम है, लेकिन क्या ये कमियां सिर्फ एक धर्म में हैं और बाकी धर्म पूरी तरह से सही हैं ? क्या फिल्मकारों को अन्य धर्मों की गलत मान्यताओं को भी अपनी फिल्मों में नहीं दिखाना चाहिए ? हम इस बात से सहमत हैं कि फिल्मकारों को समाज में या धर्म में जो गलत लगता है, उसे समाज के सामने रखना चाहिए, लेकिन यह एकतरफा हो, इसे तो गलत ही कहेंगे ना।

Freedom of Expression

कुछ ही दिन पहले गोवा में हुए 48वें भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में मलयाली फिल्म S.Durga को लेकर काफी विवाद हुआ। दरअसल यह विवाद फिल्म के नाम को लेकर था। बता दें कि फिल्म का असली नाम Sexy Durga जिसे विवादित बताकर इसका प्रदर्शन रोक दिया गया। हालांकि बाद में इसका नाम बदलकर S.Durga कर दिया गया। लेकिन अंत तक यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। जिसे लेकर काफी हो-हल्ला भी हुआ। लेकिन क्या Freedom of Expression के नाम पर लाखों लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत करना सही है। जैसा कि सभी जानते हैं Sexy शब्द पाश्चात्य सभ्यता की देन है, जिसका मतलब कामुकता से जोड़ा जाता है, ऐसे में करोड़ों लोगों की अराध्य देवी के नाम से इस शब्द से जोड़ना कितना सही है ?

जब इन मुद्दों पर हम टीवी चैनलों की बहस में कथित बुद्धिजीवियों की बातें सुनते हैं तो ऐसा लगता है कि ये बुद्धिजीवी मानते हैं कि जो बौद्धिक स्तर इन लोगों का है, या फिर सहनशीलता की सीमा इनकी है, देश के करोड़ो लोगों की भी ऐसी ही है। भारत जैसे विविधता भरे देश में जहां लोगों का रहन-सहन, भाषा, खान-पान मान्यताएं सब काफी अलग अलग है, वहां लोगों की Freedom of Expression भी अलग अलग होगी। इसलिए किसी एक व्यक्ति के लिए जो बात अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आती है, संभव है कि किसी दूसरे व्यक्ति के लिए वह काफी संवेदनशील मुद्दा हो !

अब अगर ये सवाल उठेगा कि ऐसे तो समाज में गलत को कोई गलत नहीं कहेगा तो फिर उसका जवाब ये है कि आलोचना इतना कड़ी ना हो कि कोई पचा ही ना पाए और सबसे खास बात आलोचना सभी धर्मों और संप्रदायों की समान रुप से हो, अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ किसी खास तबके तक सीमित ना हो !

Freedom of Expression

लोकतंत्र की आजादी

 

अब बात करें अगर Democracy की आजादी कि तो मौजूदा माहौल को देखकर ऐसा महसूस होता है कि जो व्यक्ति देश के खिलाफ बाते कर रहा है, या सिस्टम की खिलाफत करता है तो वह उतना ही बड़ा बुद्धिजीवी या संविधान का उतना ही बड़ा जानकार है, जिसने संविधान को घोटकर पी लिया है, खासकर मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी वाले भाग को। कुछ लोग सरेआम देश के टुकड़े होने की कामना करते हैं, आतंकियों की बरसी मनाते हैं। हैरानी की बात है कि यह सब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हो रहा है। वहीं जब इसका विरोध किया जाता है तो कथित बुद्धिजीवियों का जवाब होता है कि लोकतंत्र में उनकी आवाज को दबाया जा रहा है ! उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है !

 

ठीक है.. मानते हैं कि इस देश में सभी को बोलने की आजादी है, हर किसी के अधिकार हैं, लेकिन अगर ऐसा है तो उस जवान को भी अधिकार होना चाहिए, जो सीमा की रक्षा करता है। क्या कभी सोचा है कि जब सीमा पर गोलीबारी हो और सेना का जवान यह कहकर लड़ने से इंकार कर दे कि उसे भी जीने का अधिकार है और ये अधिकार उसे लोकतंत्र देता है, तो फिर क्या होगा ? बहरहाल ये कुछ कल्पनाएं है, जो सोचते सोचते दिमाग में आ गईं। लेकिन ये कौन-सी आजादी है, जो देश को तोड़ने की बात करती है ?

Freedom of Expression

आजकल वंदेमातरम और राष्ट्रगान को लेकर भी विवाद किया जा रहा है। बहरहाल ये फेहरिस्त काफी लंबी है। लेकिन यहां इस मुद्दे पर बात करने का मकसद सिर्फ ये बताना है कि हम एक सिस्टम से बंधे हैं, जिसके कुछ दायरे हैं और हमें इसकी सीमा का हर हाल में सम्मान करना ही चाहिए। वरना अगर सभी लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपनी मनमर्जी करने लगेंगे तो हालात काफी बुरे हो सकते हैं।

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