सूखे के हालात में भी खेती कर छोटा किसान बना लखपति, जानें कैसे

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Modern farming technology

महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में एक किसान ने खेती करने का एक ऐसा अनूठा तरीका अपनाया जिसके जरिए लाखों किसान अपनी सूखी जिंदगी को आबाद कर सकते हैं। मराठवाड़ा के बीड़ जिले के किसान विश्वनाथ बोवाडे ने विपरित परिस्थितियों में एक हेक्टेयर में खेती कर 7 लाख का प्रॉफिट कमाया। बीड़ जिला मराठवाड़ा का सबसे सूखाग्रस्त जिला है। 2012 के बाद इस जिले में सबसे ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है।

खेती में किया अनूठा प्रयोग

1)    Multi Cropping: (एकसाथ कई फसलों की खेती)

कई सालों तक खेती करने के बाद विश्वनाथ को महसूस होने लगा कि साल में केवल दो फसल उगाकर वे प्रॉफिट नहीं कमा कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने एकसाथ कई फसल उगाने का फैसला किया। वे धान, गेहूं के साथ-साथ तुरई और करेला उगाने लगे। विश्वनाथ को इसका बहुत फायदा मिला।

2)    Building own water storage system: (वाटर स्टोरेज टैंक)

मराठवाड़ा में सिंचाई की बहुत समस्या है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं उपलब्ध हो पाता है। विश्वनाथ ने इसके लिए अपने खेत में एक बड़ा गड्ढा खुदवाया। गांव के पास से गुजर रही नदी से उन्होंने अपनी खेत तक पाइप लाइन बिछाई। पानी की किल्लत के मद्देनजर सिंचाई के लिए उन्होंने फव्वारा सिस्टम का इस्तेमाल किया। फव्वारा सिंचाई से पानी की काफी बचत हुई। जमीन में लगातार नमी की मात्रा रहने लगी। नम जमीन पर उन्होंने सब्जियों की खेती शुरू कर दी। धीरे-धीरे उन्होंने उन्होंने धान, गेहूं के साथ-साथ टमाटर और तरबूज को उगाना शुरू कर दिया।

3). Crops planning according to season: (सीजन के हिसाब से खेती)

विश्वनाथ सीजन के हिसाब से खेती करते हैं।  इसी का नतीजा है कि वे  एक साल में तीन बार खेती करते हैं जिसमें वे 6,7 अलग-अलग चीजें उगाते हैं। पारंपरिक फसलों के साथ वे सब्जियां जरूर उगाते हैं। एक वक्त में उनके खेत धान, गेहूं की फसल लहलहा रही होती है तो साथ में टमाटर, तुरई, करेला, गोभी समेत कई सब्जियां भी पैदा होती है। विश्वनाथ के मुताबिक ज्यादा कमाई सब्जियों से होती है।

3)    Using new technology for farming: (तकनीक का इस्तेमाल)

विश्वनाथ ने खेती करने का पारंपरिक तरीका बदला। उन्होंने खेत में 3-4 फुट चौड़ी मिट्टी की पट्टियां बनवाई जिसकी ऊंचाई करीब 6-8 इंच तक होती है। दो पट्टियों के बीच 7-8 फीट की दूरी होती है। सभी पट्टियों पर लकड़ी और सिमेंट की चादर डाल दी गई ताकि मिट्टी ढहे नहीं। विश्वनाथ ने इन पट्टियों पर ज्यादा करीब कर बुआई की। दो पेड़ों के बीच की दूरी काफी कम रखी गई जिसकी वजह से ज्यादा पेड़ों की बुआई हुई। पट्टियों पर बुआई होने के चलते फसलों को किसी तरह का नुकसान भी नहीं पहुंच पाता है। मिट्टी के पट्टियों पर बाहरी दबाव नहीं पड़ने से जड़ों को फलने-फूलने का ज्यादा मौका मिलता है और हर पेड़ ज्यादा अंकुरित पैदा होता है। इसके अलावा दो पट्टियों के बीच सब्जियों की खेती करने लगे।

4). Use of mulching process: (खेत पर घास-फूस की चादर)

प्राकृतिक नुकसान को कम करने के लिए खेत के ऊपर  घास-फूस का छाता लगा दिया जाता है। इसकी वजह से धूप का असर कम हो जाता है। जमीन की नमी भी ज्यादा समय तक बरकरार रहती है। अगर धूप का असर बहुत ज्यादा हो तो फव्वारा सिंचाई से कम पानी में भी सिंचाई हो जाती है। बारिश के पानी को स्टोर करने के लिए खेत के एक हिस्से में टैंक का भी निर्माण करवाया। वाटर टैंक की वजह से ग्राउंड वाटर लेवल का स्तर बना रहता है।

कुल मिलाकर विश्वनाथ ने खेती करने के लिए उन तरीकों को अपनाया जिसमे फसलों को कम नुकसान पहुंचे, पानी का कम इस्तेमाल हो, जगहों का ज्यादा इस्तेमाल हो, फसलें ऐसी हो जिसे कम पानी में उगाया जा सके, सब्जियों का ज्यादा उत्पादन हो। विश्वनाथ ने अपनी सोच बदली, खेती करने का पारंपरिक तरीका बदला और मराठवाड़ा समेत पूरे देश के किसानों के लिए एक उदाहरण पेश किया कि खेती भी आय का मुख्य जरिया हो सकता है। Yuva Press की कोशिश है कि इस खबर को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाया जाए ताकि देश का हर किसान खेती कर ज्यादा कमा सके। आज भी हमारा देश कृषि प्रधान देश माना जाता है।

 

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Youth Corner · Yuva Exclusive

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