आरक्षण का सही मतलब और उद्देश्य क्या है?

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Indian reservation

नई दिल्ली: आजकल जब भी आप आपना सोशल मीडिया पेज खोलोगे तो आपको एक न एक पेज आरक्षण (Indian reservation) पर अवश्य मिलेगा। कुछ लोग उस पोस्ट में बता रहे होते हैं कि आरक्षण गलत होता है तो कुछ कहेंगे की यह सही है। मैं यह नहीं जानना चाहता कि भारत के किस सविधान में यह लिखा हुआ है कि आरक्षण जाति के आधार पर बटा है।

आरक्षण को समझने के लिए हमें पहले इसकी मूल धारणा को समझना होगा। जब हम अलग अलग लोगों से इसकी राय के बारे में पता करेंगे तो हमें इसका मतलब भी अलग अलग ही प्राप्त होगा। कोई आपको यह कहता हुआ मिल जायेगा कि यह बाबा साहेब लिख कर गये थे उसके खिलाफ है तो कोई यह कहता हुआ मिल जायेगा कि इसकी मूल धारणा संविधान के खिलाफ है।

जातिगत आरक्षण, राजनीतिक पार्टियां का बहस का मुद्द क्यों?

वैसे देखा जाये तो आरक्षण के मूल धारणा को कोई समझना ही नहीं चाहता है। आज समय तो ऐसा आ गया है कि भारत के सभी राजनीतिक पार्टियां बस इस पर बहस करना चाहते हैं ताकि किसी तरह सें उनका वोट बैंक बचा रहें। अब समझ में नहीं आता की राजनीतिक पार्टियां इसको वोट बैंक क्यों समझती है।

Indian Reservation के मुद्दे को समझने की कोशिश करने पर पता चलता है कि इसका कुछ हद तक जातिगत आरक्षण के आधार पर जुड़ा हुआ है। आखिर ऐसा क्यों? संविधान के अनुसार इसे जानने की कोशिश करेंगे तो हमें पता लग जायेगा कि जिस समय यह सविंधान में रखा गया होगा उस समय इसकी मांग अवश्य रही होगी तभी बाबा साहेब ने इसको रखा होगा। कोई भी व्यक्ति इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकता लेकिन आरक्षण होना चाहिए या नहीं यह एक अलग मुद्दा है। आज आमलोगों की राय हमेशा जातिगत आरक्षण पर आ कर टीक गई है।

आरक्षण (Indian Reservation) के लिए साल 932 गोलमेज सम्मेलन

साल 1932 में एक सम्मेलन हुआ था जिसका नाम गोलमेज था। इसमें इस बात की सहमति बनी थी कि आरक्षण होना चाहिए तो किस आधार पर। इस सम्मेलन में यह तय किया गया था कि समाज के वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए है उनकी एक सूची तैयार की जाये और इसी सूची के आधार पर इनके लिए कुछ प्रावधान रखा जाये ताकि इनको समाज के मुख्य धारा में लाया जा सकें। इसी प्रावधान के बाद इसे सविधान में रखा गया था। बाद में इस सूची का नाम अनुसूचित जनजाति रखा गया। कुछ समय बाद इस सूची में एक और नया सूची जोड़ा गया था जिसका नाम अत्यंत पिछड़ा वर्ग दिया गया।

आरक्षण का मूल अर्थ प्रतिनिधित्व है। आरक्षण कभी भी पेट भरने का साधन नहीं हो सकता बल्कि आरक्षण द्वारा ऐसे समाज को प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया जाना चाहिए जो समाज के अंदर दबे कुचले जा रहे हैं। वैसे यह जब बना था तो इसे 10 सालों के लिए पास किया गया था और उस समय इसे लागु करने का उद्देश्य बस इतना था कि समाज के जो लोग उपेक्षित है उन्हें भी प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलें।

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