क्यों खास है Swami Vivekananda द्वारा शिकागो में दी गई ऐतिहासिक Speech ?

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National Youth Day

Swami Vivekananda का नाम भारतीय इतिहास के ऐसे महापुरुष के रुप में दर्ज है, जिन्होंने कम उम्र में ही अपने ज्ञान का पूरी दुनिया में लोहा मनवाया। स्वामी विवेकानन्द सन्यासी होने का साथ ही एक सच्चे देशभक्त भी थे। यही कारण है कि उनके भाषणों में हमेशा राष्ट्र निर्माण की बातें प्रमुख होती थी। खासकर युवाओं को वह राष्ट्र निर्माण का नायक मानते थे। यही वजह है कि स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस को “राष्ट्रीय युवा दिवस “ (National Youth Day) के रुप में मनाते हैं।

Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानन्द का जिक्र हो और शिकागो की धर्मससंद में उनके द्वारा दिए गए भाषण का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिकागो में दिए गए स्वामी जी के भाषण ने पूरी दुनिया में भारत, हिंदू धर्म और उसके दर्शन के प्रति पूरी दुनिया का नजरिया बदल दिया था। स्वामी जी ने जैसे ही बहनों और भाईयों कहकर अपने भाषण की शुरुआत की तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। आज जब पूरी दुनिया में सांप्रदायिकता, कट्टरवाद बढ़ रहा है, ऐसे समय में Swami Vivekananda की बातें खासकर याद आती हैं।

भारत को पिछड़ा, गरीब और संपेरों का देश माना जाता था। लेकिन Swami Vivekananda ने 11 सितंबर, 1893 में शिकागो में दिए अपने भाषण से पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति और इसके दर्शन से रूबरु कराया। माना जाता है कि विदेशों में भारतीय दर्शन, योग को लोकप्रिय करने में स्वामी विवेकानन्द का बहुत बड़ा हाथ था।

स्वामी विवेकानन्द का हिंदू संस्कृति और इसके मूल्यों के प्रति प्रेम का अंदाजा एक मजेदार प्रसंग से लगाया जा सकता है। दरअसल एक बार एक विदेशी ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा कि वह किस जानवर का दूध सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। स्वामी जी ने जवाब दिया कि ‘भैंस का’। इस पर उस अंग्रेज ने पूछा कि आपके धर्म में तो गाय की पूजा की जाती है, तो क्या आप गाय का दूध पसंद नहीं करते ?

इस पर Swami Vivekananda ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर अंग्रेज निरुत्तर हो गया। स्वामी जी ने कहा कि गाय को हम मां मानते हैं और आपने पूछा था कि आप किस जानवर का दूध पसंद करते हैं। तो ऐसे में मैं गाय का नाम कैसे ले सकता हूं ?

12 जनवरी को पूरा देश उनकी जयंती मना रहा है। इस उपलक्ष्य में हम शिकागो (Chicago) में दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषण की कुछ प्रमुख बातें यहां बता रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि शिकागो में दिए गए उनके भाषण के आज के संदर्भ में क्या मायने हैं ?

Swami Vivekananda

शिकागो में दिया गया Swami Vivekananda का भाषण

“अमेरिकी बहनों और भाईयों, आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा ह्रदय बेहद खुशी से भर गया है। मैं आपको दुनिया के सबसे पौराणिक भिक्षुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूं।”

“मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं, और मैं भारत के विभिन्न जाति संप्रदायों के लाखों-करोड़ों लोगों की तरफ से आपको धन्यवाद देता हूं। इसके साथ ही मैं इस मंच के उन वक्ताओं को भी धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने अपने भाषण में यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार पूरब के देशों से फैला है।”

“मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसनें दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति (Universal Acceptence) का पाठ पढ़ाया। हम सिर्फ सहनशीलता और Universal Acceptence में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम दुनिया के सभी धर्मों को भी सत्य के रुप में स्वीकार करते हैं।”

“मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने धरती के विभिन्न देशों में सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे गर्व है कि हमने उन इजरायलियों की अच्छी यादें बचाकर रखी हैं, जिनके मंदिरों को रोमनों ने तहस-नहस कर खंडहर बना दिया था। जिसके बाद इन इजरायलियों ने दक्षिण भारत में शरण ली थी।”

“मुझे गर्व है कि मैं ऐसे देश से हूं, जिसने महान पारसी देश के लोगों को शरण दी और आज भी बढ़ावा दे रहा है। भाईयों मैं आपको एक श्लोक की पंक्तियां सुनाना चाहता हूं, जिसे मैने बचपन से पढ़ा है और लाखों लोग रोजाना इसे दोहराते हैं।”

।।रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
“जिस तरह विभिन्न धाराओं, नदियों की उत्पत्ति विभिन्न स्त्रोतों से होती है, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा अनुरुप अलग अलग मार्ग चुनता है। वो दिखने में भले सीधे-सादे और टेढे-मेढे लगे, लेकिन सभी एक ही ईश्वर तक जाते हैं।”

“यह सभा, जो आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है, गीता में बताए गए एक सिद्धान्त का प्रमाण है।”

।।ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम। मम वत्मार्नुर्वतते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।
“मतलब जो कोई भी मेरी और आता है, चाहे किसी भी रुप में, मैं उसका तक पहुंचता हूं। सभी लोग अलग-अलग रास्तों पर संघर्ष कर रहे हैं, उसका अंत मुझमें है।”

“सांप्रदायिकता, कट्टरता और इनके भयानक वंशज हठधर्मिता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजे में जकड़े हुए है। इन्होंने धरती को हिंसा से भर दिया है। कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हुई। इस दौरान कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता !”

“लेकिन, अब इनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिता, हर तरह के क्लेश, चाहे वो तलवार से हों या कलम से, और हर एक मनुष्य, जो कि एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं, उनके बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।”

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Youth Corner · Yuva Exclusive

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