भारत के अनोखे स्कूल : कहीं पढ़ाई के बाद कराई जाती है शादी, कहीं सिखाई जाती हैं किताबों से बाहर की कला !

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 27 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। आजकल हर कोई शिक्षा पर विशेष जोर दे रहा है, कम आय वाले लोग भी अपने बच्चों की शिक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं और उन्हें अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाकर अच्छी शिक्षा दिलाने के लिये प्रयासरत् हैं। हालाँकि लोगों की शिक्षा को लेकर बढ़ती रुचि का कुछ गैर सरकारी संगठन फायदा भी उठाते हैं और उनके निजी स्कूलों में तरह-तरह की फीस के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठने का काम करते हैं और उन्होंने शिक्षा को व्यापार बना दिया है। हालाँकि हम देश के कुछ ऐसे स्कूलों के बारे में आपको जानकारी देंगे, जिनकी परंपराएँ आपको आश्चर्य में डाल देंगी।

यहाँ मिलती है सिलेबस से हटकर शिक्षा

अहमदाबाद के रामनगर क्षेत्र में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ सभी स्कूलों से हटकर आउट ऑफ सिलेबस शिक्षा दी जाती है। इस स्कूल का नाम ‘हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला ‘गुरुकुलम्’’ है। इस स्कूल में बच्चों को अन्य सामान्य स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले सिलेबस से हटकर भारतीय प्राचीन विद्याओं की शिक्षा दी जाती है। इस स्कूल के संचालक उत्तमभाई शाह हैं। आधुनिक कंप्यूटर युग और विज्ञान के जमाने में उत्तमभाई शाह ने भारतीय सुसंस्कृत प्राचीन शिक्षा प्रणाली को फिर से देश में संस्थापित करने की परिकल्पना की। इस स्कूल में जो गणित पढ़ाया जाता है वह आधुनिक गणित नहीं बल्कि वैदिक गणित है। आधुनिक विज्ञान के स्थान पर प्राचीन खगोलशास्त्र पढ़ाया जाता है। इसके अलावा बालकों को मलखम, घुड़सवारी, संगीत, नाट्यकला, ज्योतिषशास्त्र, भूगोल, वक्तव्यकला सहित लगभग 72 विभिन्न कलाओं की शिक्षा दी जाती है। स्कूल का वातावरण पूर्णतः प्राचीन गुरुकुलम जैसा है। इस गुरुकुल में रहने वाले बालकों को शुद्ध भारतीय शैली में चूल्हे पर बना भोजन दिया जाता है, जो उन्हें पीतल के बर्तनों में परोसा जाता है। गाय का दूध पीने के लिये दिया जाता है, जिसके लिये गुरुकुलम की अपनी गौशाला भी है। विविध कलाओं के गुरु आकर इन छात्रों को विविध कलाओं की शिक्षा देते हैं। यहाँ गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जाता है।

ऐसा स्कूल, जहाँ पढ़ाई के बाद लड़कियों की शादी कराई जाती है

गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ केवल दिव्यांग लड़कियों को पढ़ाया जाता है और उनकी शिक्षा पूरी हो जाने के बाद उनके लिये योग्य वर की तलाश करके उनकी शादी भी कराई जाती है। अपनी इस खासियत के कारण ही यह स्कूल दुनिया का अनोखा स्कूल बन गया है। इस स्कूल का नाम ‘अंध कन्या प्रकाश गृह’ है। मात्र 4 बच्चों के साथ यह स्कूल शुरू किया गया था, जो अब एक विशाल आवासीय विद्यालय बन चुका है। यह स्कूल दुनिया के लिये एक मिसाल है। इस स्कूल को शुरू करने का उद्देश्य भी बहुत खास था। क्योंकि यह स्कूल मात्र दिव्यांग लड़कियों को सुशिक्षित करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से शुरू किया गया है। दिव्यांग लड़कियों की शिक्षा के लिये उचित व्यवस्था का अभाव होने से वर्ष 1954 में ‘नीलकांत राय छत्रपति’ ने 10 हजार रुपये के फंड से इस स्कूल की शुरुआत की थी। इस स्कूल की देखरेख की जिम्मेदारी ‘अंध कन्या प्रकाश गृह’ नामक एक गैर सरकारी संगठन सँभालता है।यह स्कूल शारीरिक रूप से दिव्यांग लड़कियों को क्वालिटी एजुकेशन उपलब्ध कराने के साथ ही आत्मनिर्भर बनाने के लिये भी काम करता है। इस स्कूल की लड़कियों द्वारा बनाई जाने वाली चिक्की, दीवाली के दिये और कई हथकरघा प्रोडक्ट को बाजार में बहुत पसंद किया जाता है। इन दिव्यांग लड़कियों को धारा-प्रवाह अंग्रेजी बोलते सुनकर आप दाँतों तले अँगुलियाँ दबा लेंगे। यह दिव्यांग छात्राएँ पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के मामले में किसी भी सामान्य छात्रा से बिल्कुल भी कम नहीं हैं। इतना ही नहीं, जब दिव्यांग लड़कियाँ पढ़-लिखकर तैयार हो जाती हैं और आत्मनिर्भरता के सारे काम सीख जाती हैं, तो संस्थान की ओर से उनके लिये योग्य वर तलाशकर उनकी शादी भी करवाई जाती है। यही बात इस स्कूल को अन्य सभी स्कूलों से अनोखा बनाती है।

फीस की जगह लिया जाता है कचरा

पूर्वोत्तर के राज्य असम की राजधानी गोवाहाटी में एक नव दंपति ने एक अनोखा स्कूल खोला है। इस स्कूल में दाखिला लेने की शर्त आपको थोड़ी अटपटी लग सकती है। क्योंकि यहाँ बच्चों से कोई फीस नहीं ली जाती है, बल्कि फीस के स्थान पर प्लास्टिक का कचरा उगाहा जाता है। हर बच्चे को हर हफ्ते कम से कम प्लास्टिक की 25 चीजें फीस के रूप में स्कूल में जमा करानी होती हैं। इस स्कूल के परिसर में ही प्लास्टिक का रिसाइकलिंग यूनिट लगाया गया है। बच्चों से जमा हुए प्लास्टिक को इस यूनिट में रिसाइकल करके इकोलॉजिकल ईंटों में तब्दील किया जाता है। यह ईंटें पर्यावरण के लिये अनुकूल होती हैं। इस यूनिट को भी स्कूल के बच्चे ही संचालित करते हैं। गोवाहाटी के गौरचुक इलाके में माजिन मुक्तार और उनकी पत्नी परमिता सारमा ने 2016 में ‘अक्षर फॉरम’ नाम से इस मॉडल स्कूल की स्थापना की थी। इस स्कूल में लगभग 110 बच्चे पढ़ते हैं, जिनकी उम्र 4 से 15 वर्ष के बीच है। यह बच्चे आसपास के पामोही, बोरागाँव और गोरचुक गाँव से आते हैं। परमिता के अनुसार इन गाँवों में बड़े पैमाने पर प्लास्टिक को जलाया जाता है, जिससे हवा में प्रदूषण फैलता है। इसलिये उन्होंने निर्णय किया कि वह इस बारे में लोगों को जागरुक करेंगे। उन्हें बताएँगे कि प्लास्टिक को जलाने से स्वास्थ्य पर कितना घातक प्रभाव पड़ता है। माजिन वर्ष 2013 में न्यूयॉर्क से एक स्कूल प्रोजेक्ट के सिलसिले में भारत आये थे। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से सामाजिक कार्य के लिये विद्यार्थियों का एक दल भी आया था, तभी परमिता से उनकी मुलाकात हुई थी। माजिन उस समय शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहे थे, उन्होंने पाया कि पत्थर की खदानों में तथा अन्य फैक्ट्रियों में बहुत छोटी उम्र के स्कूल छोड़ चुके बच्चे काम करते हैं। इसलिये उनकी आर्थिक मदद करने और उन्हें बेहतर शिक्षा देने के लिये दोनों ने मिलकर इस स्कूल की नींव रखी।

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News · Personality development · Youth Corner

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